Saturday, July 28, 2007

नीले पीले फूल ( कहानी)

भई, अबके गर्मियों की छुट्टियों मे हिंदुस्तान मेही कहीं चलेंगे। परदेस चलने का कुछ मूड नहीं बन रहा!"सुबह
बाथरूम मे खड़ा विपुल शेव करते करते अपनी पत्नी नीरा से बतियाने लगा। कुछ देर उसकी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर फिर आगे बोल पडा ,"सोंचता हूँ,पहले तो शिमला चल पड़ें ,फिर आगे की देखी जायेगी। वैसे तो घिसी पिटी जगह है, गर्मियों मे भीड़ भी रहेगी ,लेकिन बच्चे भी तो बेरौनक जगह जाना नही चाहते ना अब!"

विपुल बिना नीरा की ओर देखे बोला चला जा रहा था। अगर देख लेता तो शायद बड़ा चकित हो जाता। हिमाचल की उस राजधानी का नाम सुनते ही नीरा ऎसी कंपित हो उठी , जैसे किसी हिमशिखा से चला सर्द हवा का झोंका उसे छू गया हो! उस के मन का एक मूर्छित सोया कोना हज़ारों झंकारों के साथ जाग उठा। पिछली शाम dryclean हो आयी साडीयां अलमारी मे लटकाती नीरा एकदम रूक सी गयी, मानो उस की किसीभी हलचल से विपुल अपना विचार बदल ना दे। नीरा के इस बर्ताव के पीछे एक रहस्य था,जो दबा पडा एक किताब के पन्नोमे,और वो किताब पडी हुई थी उसी अलमारी मे,पिछले कयी वर्षों से।

"भई!कुछ बोलो भी!!क्या सरकार को हमारा ख़्याल पसंद नही आया?अगर नही तो तुम जहाँ कहोगी वहीं चलेंगे, परदेस ही कही चलना है तो ....."

"नही,नही,ऎसी बात नही!!मैं तो बस किसी सोंच में उलझ गयी थी......अबकी बार वाकई शिमला ही चलेंगे,"नीराने अपने आप पे काबू पाते हुए कहा। लेकिन फिरभी उस का अन्तिम वाक्य गौर से सुन ने वाले को लगता जैसे अर्धस्पप्नावस्था मे कहा गया हो। विपुल का घ्यान नही था। शेव ख़त्म होतेही ही उसने नहाने के लिए बाथरूम का दरवाजा बंद कर लिया।

बच्चे तो सुबह ही स्कूल चले गए थे। नाश्ता करके विपुल भी जब ऑफिस चला गया तो नीरा ने अपनी अलमारी खोली। उसमे से वो किताब निकाली और खोला वो पन्ना जहाँ चंद सूख नीले,पीले फूल चिपके हुए थे उसने उन्हें धीरेसे छुआ और अनायास बोल पडी ,"उसका पता मैं लगा पाऊँगी?"

खडी ,खडी ही नीरा अतीत मे खो गयी। बीस साल पहले अपने माँ-बाबूजी के साथ वो शिमला गयी थी। केवल चौदह वर्षीया लडकी थी तब नीरा।
"होटल हिमाचल"मे रुके थे वे लोग। साफ सुथरा,बड़ी ही सुन्दर जगह स्थित होटल था वो। वहाँ एक अठारह,उन्नीस साल का वेटर काम करता था। ख़ूब हंसमुख,लेकिन उतनाही सभ्य और बेहद फूर्तीला। बाबूजी तो उसपर एकदम लट्टू हो गए थे। सुबह और रात मे तो वो नज़र आता था dining हाल मे लेकिन दिनके समय नही। एक दिन बाबूजीने पूछ ही लिया,"भई तुम दिन मे नही नज़र आते?सिर्फ सुबह और रातमेही काम करते हो क्या?"

"जीं,दिन मे मैं कालेज जाता हूँ। "
"अच्छा? क्या पढ़ते हो?" बाबूजी ने पूछा।
मैं m.b.b.s के फर्स्ट year मे हूँ। "वो बोला।
"वाह,भई वाह!!बडे होनहार हो!! लेकिन बुरा ना मानो तो एक बात पूछूं बेटा?" बाबूजी ने बडे प्यारसे कहा।
"जीं,बिलकुल पूछिए,"उसने नम्रता से जवाब दिया।
"बेटा तुम्हारे घरमे और कोई कमाने वाला नही है क्या?मेरा मतलब है,वैसे तो खुद कमाना और पढना अच्छी बात है। आत्मसम्मान बना रहता है,लेकिन मेडिसिन की पढाई कुछ अधिक होती है ना इसलिये पूछ रहा हूँ," बाबूजी बोले।
"बाबूजी, दरअसल मेरे पिताका कुछ साल पहले बीमारी से देहांत हो गया । हम लोग रहनेवाले देहरादून के थे। पिताजी का वहाँ छोटा सा कारोबार था। माँ तो मेरे बचपन मे ही चल बसीं थीं। मैं अकेली ही संतान था। मेरे पिताजी का अपने छोटे भाई पर बड़ा विश्वास था। मरने से पहले अपना सारा कारोबार पितीजी ने उन्हें सौप दिया। सोंचा,चाचाजी कारोबार के पैसों से मुझे पढा देंगे और बादमे यथासमय कारोबार मेरे हवाले कर देंगे। लेकिन चाचाजी ने सब हड़प लिया। घर मे मुझे बड़ा तंग करने लगे। मैं अपनी पढाई हरगिज़ नही छोड़ना चाहता था। घर छोड़ काम की तलाश मे यहाँ चला आया। इस होटल मे काम करते हुए पढने लगा।
"दरअसल, इस होटल के जो मालिक है ना, बडेही भले आदमी है। उन्हों नेही पहले तो स्कूल मे, फिर मेडिकल कालेज मे दाखिला कराया। उनकी ऑलाद नही है। अकेले ही रहते है। कहते है, पढाई का पूरा खर्चा वोही देंगे। मुझे तो काम करे से भी रोकते हैं,पर मेरा मन नही मानता। सुबह एक डेढ़ घंटा तथा रात मे एक डेढ़ घंटा काम कर लेता हूँ। "
कुतूहल और प्रशंसा से नीरा भी सब कुछ सुन रही थी। वाकई कितना नेक और सरल,सच्चा इन्सान है ये! होटल के मालिक के प्रती भी उस का मन श्रद्घा से भर आया।
"शाबाश बेटे,शाबाश! बोहोत ख़ूब!!अच्छा बताओ तुम्हारा नाम क्या है?"बाबूजी ने पूछा।
"नाम तो मेरा निरंजन है,वैसे सब मुझे राजू ही कहते है।" निरंजन ने बताया।
जब निरंजन वहाँ से हट गया तो माँ ने भी कह दिया,"बड़ाही होनहार लड़का है! भगवान् इसे सफलता दे और होटल के मालिक को लम्बी उम्र!!"

एक दिन सुबह होटल के lon के एक कोनेमे नीरा को कुछ घांसके फूल दिखाई दिए। बडेही सुन्दर,कोमल। उसने धूप सेकते बैठे बाबूजी से चिहुक के कहा,"बाबूजी! देखिए तो! कितने सुन्दर फूल है ये!!"
इन्हें तोड़ कर अपनी किसी किताब मे रख लेना। ये एक यादगार बन जायेंगे,"बाबूजी बोले।
"आज नही। जिस दिन चंडीगढ़ के लिए वापस चलेंगे ना, उस दिन मैं इन्हें किताब मे दबा कर रख लूंगी",नीरा ने कहा था।

जिस दिन चलने लगे उस दिन नीरा उन फूलोंके बारेमे भूल ही गयी। माँ टैक्सी मे समान रखवा रहीं थी,बाबूजी होटल का बिल अदा कर रहे थे,नीरा ,कुछ भूला तो नही ,ये देखने के लिए अपने कमरे के ओर बढ़ी तो दरवाज़ेपर वही घांस के फूल लिए निरंजन खङा था।
"उस दिन आप अपने बाबूजी से कह रही थी ना,ये फूल बडे सुन्दर हैं,"कहते हुए उसने उन घांस के फूलोंका छोटासा गुच्छा नीरा की ओर बढाया। चकित ,भरमायी -सी नीराने आंखें उठाके उसे देखा तो पाया कि वो बेहद उदास निगाहोंसे उसे अपलक देख रहा था। एक अबीब-सी , अजनबी संवेदना उसके अन्दर तक दौड़ गयी, जिसका उस समय उसका अबोध किशोर मन नामकरण नही कर पाया। महसूस हुई कान और गालों पर एक अनोंखी गरमी। उसने निरंजन के हाथोंसे फूल लिए और शरमा कर टैक्सी की ओर चल दीं। निरंजन उसके पीछे आया । तब तक बिल अदा करके बाबूजी भी वहाँ पोहोच चुके थे।
नीरा के हाथ मे फूल देखे तो बोले,"अरे फूल इक्ट्ठे कर रही थी हमारी बिटिया!"
"जीं,!"इस से आगे नीरा कुछ बोल नही पायी।
माँ बाबूजी ने निरंजन की ओर मुखातिब हो उसे जीं भर के शुभ कामनाएं दीं। निरंजन ने हाथ जोडे और टैक्सी चलने के पहले ही तेज़ कदमों से अन्दर मुड़ गया। नीरा समझ नही पायी कि उसकी आंखों मे उन वादियों के कोहरे की नमी थी!
चंडीगढ़ से जब वे लोग शिमला की ओर चले थे पूरा रास्ता नीरा चिड़िया की तरह चिहुकती आयी थी। लॉटते हुए उसे उस अर्ध क्षण की अनुभूती ने कितना अंतर्मुखी बना दिया था!

घर पहुँचते ही नारा ने उन फूलोंको अपनी एक किताब मे दबा दिया। देखते ही देखते वर्ष बीत ते गए। उन गर्मियों के बाद उस परिवार का कभी दोबारा शिमला जाना ही नही हुआ। उन्नीस वर्ष की पूरी होते,होते नीरा की विपुल से शादी भी हो गयी।
विपुल के पास धन दौलत की विपुलता तो थीही , उसने नीरा लो चाहा भी बेहद। वैसे स्वभावत: वो बड़ा हँसमुख और बातूनी था।
एक दिन उसने नीरा को कहा था,"तुम जब भी बाहर निकला करो ना, तब धूप का काला चश्मा आंखों पे लगा लिया करो"।
"क्यों",नीरा ने हैरत से पूछा था।
"पता नही,मेरी तरह कौन,कौन बेचारे इन इनकी गिरफ्त मे आकर घायल होते होंगे?"विपुलने छेड़ा।
"अच्छा??जैसे लोगों को मेरी आँखों मे झांक ने के अलावा दूसरा कोई काम ही नही!"नीरा ने कहा था।
"अजी,हम भी उन्ही निकम्मों मे से एक हैं,क्या भूल गईँ?तुम जब चंडीगढ़ से अपने चाचा के पास आयी थी तो canaught प्लेस मे हमने तुम्हे देख लिया था, और ऐसा पीछा किया, ज़िंदगी भर छूटेगा नही,"विपुल ने शरारत से याद दिलाया था।
लेकिन इतना भरा पूरा घर-संसार होते हुए भी नीरा के मन का एक कोना बिलकुल सूना ,अछूता रह गया था। एक सुनसान,अंधेरी गूफा की तरह।

ना जाने नीरा कितनी देर खयालों मे खोयी रही। जब गर्मियों की छुट्टियों की जब तैयारियां होने लगी तो नीरा मे एक अजीब सी चेतना भर गयी। लड़कपन की अधीरता से वो शिमला जानेका इंतज़ार करने लगी। इतना उल्लसित उसे उसके परिवालों ने शायद ही कभी देखा था।
"अपनी ही कार से चलेंगे!",उसने विपुल से आग्रह किया।
विपुल ने मान भी लिया।
सारा रास्ता नीरा खयालों मे खोयी रही । क्या निरंजन का पता मिलेगा??क्या वो शिमला मे ही होगा?बाबूजी से तो उसने एक दिन यही कहा था डाक्टर बन के वो शिमला मेही काम करेगा। लेकिन ज़िंदगी का क्या भरोसा?किस वक़्त किस मोड़ पर ले जाये?उसने विवाह भी कर लिया होगा!!लेकिन कर भी लिया हो तो क्या??उसके अतीत के वो कुछ पल जो नितांत उसके अपने थे, उसमे तो किसी की साझेदारी नही हो सकती!केवल उसने उन पलोंको जिया है,और किसी ने तो नही!उन पलोंकी स्मुतियों को उजागर करनेकी चाह मन और जीवन की सारी सीमा रेखाओं को पार कर उसे व्याकुल,अधीर बनाती रही।
शिमला पहुँचने के दुसरे ही दिन उसने दिन विपुल तथा बच्चों से कहा,"भयी,आज मैं अकेलेही शिमला मे कुछ देर घूमूंगी, खुद ही ड्राइव भी करूंगी । "
विपुल हैरानी उसे देखता रहा,बोला,"अकेली? क्यों?और खुद ही ड्राइव भी करोगी?तुम देहली मे तो इतना डरती हो कार चलाने से और यहाँ ड्राइव करोगी??इन अनजान पहाड़ी रास्तोंपे??
"बस ऐसे ही मन कर रहा है.बोहोत साल पेहेले माँ-बाबूजी के साथ यहाँ आयी थी। उन्ही यादोंको अकेले उजागर करना चाहती हूँ",नीरा ना चाहते हुए भी कुछ खोयी-सी बोली।
ओहो??ऎसी कौनसी यादें हैं जो हम नही बाँट सकते ?और फिर होटलकी भी कार सर्विस है,उससे जाओ। गाडी मत चलाओ। आख़िर किसलिये रिस्क लेना चाहती हो?" विपुल ने हर तरह से उसे रोकना चाहा, लेकिन नीरा के साथ हर बेहेस बेअसर थी। बच्चे भी माँ के इस बदले हुए रुप को हैरत से देखते रहे, बोले कुछ भी नही। विपुल ने हार के कार की चाभियाँ नीरा को पकडा दीं और हताश हो कमरेमे बैठ गया।
नीरा ने होटल से रोड़ मैप ले लिया और "होटल हिमाचल"की ओर चल दीं। एक अनाम धुन मे सवार,कहीं कोई अपराध बोध नही। केवल एक आत्यंतिक उत्कंठा। क्या निरंजन को वो तलाश पायेगी??

"होटल हिमाचल"पोहोंच के उसने कार पार्क की। होटल का हूलीया काफी बदला हुआ नज़र आ रहा था। पहले कितना साफ सुथरा हुआ करता था ये होटल!
काउंटर पर पोहोच कर उसने मेनेजर से कहा, 'देखिए मैं यहाँ किसी का पता पूछने आयी हूँ, कुछ बीस साल पहले हम यहाँ एक बार आये थे तब...."
"बीस साल पहले?पिछले दस सालोंसे मैं यहाँ मेनेजर हूँ। किसका पता चाहती हैं आप?"मेनेजर ने उसकी बात काट ते हुए उस से प्रतिप्रश्न किया।
"ओह! क्या इस होटल के मालिक से मिल सकती हूँ मैं?"नीरा ने बड़ी आशा से पूछा।
"इस होटल के जो पुराने मलिक थे,देहांत हो गया,कुछ सात साल पहेले। नए मालिक तो...."
हे भगवान्!पुराने मालिक का देहांत हो गया?"नीरा एकदम हताश हो उठी। अब कौन उसे निरंजन का पता बतायेगा??
उसकी निराशा देख,मेनेजर ने उस से कहा,"देखिए,इस होटल के जो पुराने मालिक थे,सुना है उन्होने एक वेटर को बिलकूल अपने बेटे की तरह रखा था, शायद वो आपकी ......"
"कहाँ है वो? क्या करता है?शिमला मे ही है?क्या आप मुझे उसका पता बता पायेंगे?"नीरा का खोया उल्लास लॉट आया और उसने सवालों की बौछार कर दीं।
"वो आजकल शिमला मे ही है, काफी जाना माना डाक्टर है,डाक्टर निरंजन्कुमार। पुराने मालिक ने पढाई के लिए उसे परदेस भी भेजा था,और उन्होनेही अस्पताल भी खुलवा दिया। "

मेनेजर जैसे,जैसे बताता गया,नीरा का चेहरा खुशी से खिलता गया। निरंजन के अस्पताल का पता जान ने के लिए वो बेताब हो उठी।
maneger ने एक कागज पे उसे रास्ते समझाते हुए पता लिख दिया। नीरा ने बे-सब्रीसे उसके हाथ से कागज छीना अपनी कार की ओर तेज़ीसे दौड़ पडी,ख़ुशी और उत्कंठा से उसका शरीर काँप सा रहा था। ये ऎसी उत्कंठा,ऐसा अछूता,अनूठा कंपन उसके लिए तकरीबन अपरिचित ही था। जिस व्यक्ती को उसने वर्षों पहेले केवल एकही बार देखा था,क्या वो ऎसी विलक्षण संवेदना जगह सकता है??नीरा को अपने आप पे अचरज हो रहा था।
अस्पताल होटल से ज़्यादा दूर नही था। पता ढूँढने मे नीरा को खास परेशानी नही हुई। गाते अन्दर घुसते ही उसने देखा कि छोटा-सा लेकिन काफी साफ सुथरा था अस्पताल। मुख्य द्वार से अन्दर जाते ही सामने बैठी receptionist ने उसे एक कार्ड थमाया, जिस पे नीरा ने कांपते हाथों से अपना नाम लिखा और वापस किया। हाल मे कुछ और लोग भी बैठे हुए थे। नीरा एक कुर्सी पर जा बैठी। इतना उत्कंठा भरा इंतज़ार तो नवपरिनीता नीरा ने सुहाग रात के दिन अपने पती का भी नही किया था। आज उसे वो व्यक्ती दिखने वाला था,जिसे इतने वर्षों मे वो कभी भी नही भूली थी। नीरा को देखते ही वो अनायास कह उठेगा,"अरे आप!!इतने सालों बाद?"
"पहचाना मुझे?" कांपते होंटों से कुछ अलफ़ाज़ फिसल पड़ेंगे। इस पर निरंजन का क्या जवाब रहेगा?
अचानक उसका नाम पुकारा गया। दरवाजा खोल कर अन्दर जाने तक उसका मुँह सूख गया शरीर पसीने से लथपथ। सामने वही निरंजन था।
नीरा मूर्तिवत खडी उसे देखती रही।
"आयिये , बैठिये !!"किसी व्यावसायिक डाक्टर की सभ्यता से निरंजन ने उस से कहा।
"हे भगवान्!!इसने लगता है,मुझे पहचाना ही नही!,"निरंजन उसे पहचानेगा नही, इस संभावना का तो उसने अनुमान ही नही किया था। वो जड़वत कुर्सी पे बैठ गयी।
"कहिये क्या तकलीफ है आप को?"डाक्टर उसे पूछ रहा था।
"जीं.....तकलीफ......नही....मुझे....मैं..."नीरा की समझ मे नही आ रहा था कि उस से कैसे पूछे,कैसे बताये??
"हाँ,हाँ,कहिये!!आप कुछ परेशान-सी लग रही हैं। आपके साथ औरभी कोई है या आप अकेली आयी हैं?"निरंजन उस से पूछ रहा था।
"जीं नही...मेरा मतलब है,जीं हाँ.......होटल मे हैं......मेरे पती और बच्चे। मैं आपके अस्पताल मे अकेली आयी हूँ। मैं पूछना चाह रही थी कि आप "होटल हिमाचल"जानते हैं?"नीरा ने पूछने की कोशिश की।
"क्या आप वहाँ रुकी हैं? वहाँ पर कोई बीमार है?मतलब आप मुझे visit पे बुलाने आयीं हैं?"
"नही,नही, मैं वहाँ नही रुकी हूँ। विजिट पे भी नही बुलाना चाहती। मैं तो .....क्या उस होटल के पुराने मालिक को...कभी....आप...जानते थे??"
नीरा की खुद समझ नही आ रहा था कि वो क्या बोल रही है।
"क्या आप उनके बारेमे जानना चाहती हैं?अफ़सोस!वो अब इस दुनिया मे नही रहे। कुछ सात साल पहेले उनका निधन हो गया,"डाक्टर निरंजन ने बताया।
"जीं...वो तो मैंने भी सुना। लेकिन...लेकिन...अबसे बीस साल पहेले हम उस होटल मे रुके थे। मतलब मैं और मेरे माँ-बाबूजी। उस समय वहाँ पे एक........."अब नीरा बेहद व्याकुल हो उठी। उसके कतई समझ मे नही आ रहा था वो उस डाक्टर से कैसे पूछे क्या कि क्या वो वही राजू है? अंत मे उसने पर्स मेसे वो लिफाफा निकाला, जिसमे वो घांस के नीले, पीले फूल रख कर साथ लाई थी। धीरे से उन फूलोंको निरंजन के सामने रखते हुए उसने पूछा,"क्या आप इन फूलोंको पहचानते हैं?क्या आपने ये फूल कभी किसीको .. ....",इसके आगे उस से बोला नही गया।
"ये क्या फूल हैं?शायद आप किसीकी तलाश मे यहाँ आयीं है!!कुछ गलत फेहेमी तो नही हुई आपको?"निरंजन ने बडे ही शांत भाव से कहा। नीर को सारी दुनिया घूमती हुई-सी नज़र आने लगी।
"क्या सच मे आप इन फूलोंको नही जानते??कुछ याद नही आपको?"नीरा बेताब हो उठी।
"नही तो!!देखिए,मैंने कहा ना,आप किसी गलत जगह पोहोंच गयी है!"निरंजन ने हल्की-सी मुस्कान के साथ फिर एकबार कहा।
"ओह!"'नीरा के होटों से एक अस्फुट-सी आह निकली।कुर्सी को थामते हुए डगमगाते क़दमों से खडी हुई,और धीरे, धीरे दरवाज़े की ओर बढ़ी। दरवाज़े का नोब घुमाते हुए एक बार फिर उसके दिल ने चाहा,जैसे वो घूम जाये,निरंजन से सीधा सवाल करे,"क्या तुम वही निरंजन नही हो? वही निरंजन,जिसने बीस साल पहले एक चौदह वर्षीया लडकी को ये घंस के फूल थमाये थे,उसे ऎसी निगाहोंसे देखा था,जिसे वो लडकी आज तलक भुला नही पायी?निरंजन !मैं वही लडकी हूँ!क्या अब भी मुझे जानोगे नही?"
लेकिन तबतक डाक्टर ने अगले patient के लिए बेल बजा दीं थी। वो बाहर निकली। कुछ ही देर पहले खुशनुमा हवामे लहराती एक चुनर तूफान की जकड मे मानो तार,तार हुई जा रही थी।
थोडी देर काउंटर को पकड़ के नीरा खडी हो गयी। अपने आप पे काबू पाने की भरसक कोशिश करती रही। फिर उसने अपने पर्समे से ,जिस होटल मे वे लोग रुके थे ,उसका फ़ोन number ,रूम नंबर तथा नाम receptionist को थमाते हुए बोली,"please,ज़रा इस नंबर पे मेरी बात करा देंगी आप?"
फ़ोन मिलाके receptionist ने नीरा को थमाया।
"हेल्लो,"धीरेसे नीराने कहा।
"हेल्लो!!नीरा??कहाँ से बोल रही हो??क्या बात है?"उधर से विपुल की चिंतित आवाज़ आयी।
"सुनो,विपुल,मैं रास्ता भटक गयी थी। किसी गलत फ़हमी मे किसी डाक्टर निरंजन कुमार की अस्पताल मे आ गयी। तुम यहाँ आकर....."
"अरे,तो अपने होटल का नाम बता के रास्ता पूछ लो!इतना मशहूर होटल है.....कोयीभी रास्ता बता देगा....घबराओ मत",विपुल ने उधर से कहा।
"नही विपुल,अब मुझ मे कार चलाने की हिम्मत नही। दरअसल तबीयत कुछ खराब लग रही है। तुम यहाँ आके मुझे ले जाओ please!"नीरा ने इल्तिजा भरे स्वर मे कहा।
"देखा ना मैं पहेले ही कह रहा था,गाडी चलाने की तुम्हें आदत नही है। ठीक है,पहोचता हूँ वहाँ। ज़रा ठीक से नाम बताना तो!"
नीरा ने नाम बताया और विपुल ने फ़ोन रख दिया।
बाहर तो धूप थी,लेकिन नीरा की आखों मे बंद वो एक निरंतर पल, बूँद-सा फिसल कर वक़्त के घने कोहरे मे खो गया। वो ठगी-सी,लुटी-सी देखती रही।
उसने पर्स मे से वो लिफाफा निकाला,जिसमे वो नीले-पीले फूल सहेज के देहली से चली थी,बरसों संजोये फूल!वेटिंग रूम के कोने मे एक कूडादानी थी। नीरा ने उसमे धीरे से लिफाफा छोड़ दिया।

विपुल तेज़ी से सीढियाँ लांघता हुआ बढ रहा था। नीरा ने झट धूप का चश्मा आंखों पर लगा लिया। कहीं विपुल उन सजल आंखों मे की धुन्द देख ना ले।
"तुम भी कमाल करती हो नीरा!!अस्पताल कैसे पोहोंची?जाना कहाँ चाह रही थी??मैं कह भी रहा था होटल की कार लेलो,लेकिन पता नही उस समय तुम्हारे सर पे क्या सवार था??"विपुल बोलता चला जा रहा था।
"कुछ नही,विपुल,जो सवार था,उतर गया। बस ऐसेही अकेले कुछ वक़्त गुज़रना चाहती थी ",नीरा ने अपने आप को ज़ब्त करने की भरसक कोशिश करते हुए कहा। अब शिमला की वो हसीं वादियाँ उसके लिए रेगिस्तान की वीरान्यियां बन चुकी थी।

रात मे काम ख़त्म करके निरंजन्कुमार अपने निवास पे डायरी लिख रहे थे,"नीरा!!पहली बार मुझे उसका नाम मालूम हुआ। जब मैंने उसे कम्रेमे घुसते देखा,तो मैं स्तब्ध रह गया। इतने वर्षों बाद मेरे सामने वही आँखें ,जिन्हें मैंने किस किस मे नही तलाशा! उन आखोंको मैं भला भूला ही कब था??अपने आपको कितनी मुश्किल से सम्भाला!अब भी वे आँखें वैसी ही थीं!उतनी ही निश्छल, niraagas !जब मैंने पहचान नेसे इनकार किया तो उफ़!कितनी आहट!उनमे की दीप्ती जैसे बुझ-सी गयी। लगा,बढ कर उसे थाम लूं,और कह दूं,"हाँ नीरा,मैं वही निरंजन हूँ,जिसे खोजती हुई तुम यहाँ आयी हो। 'लेकिन बड़ी निर्ममता से मैंने खुदको रोका। वो शादीशुदा थी। उसके कार्ड पे लिखा था,मिसेस नीरा सेठ। हमारे रास्ते कबके जुदा हो चुके थे।
प्रथमत: मुझे लगा,वो वाकयी patient के तौर पे आयी है। इतने वर्षों तक उसने मुझे याद रखा होगा,ये तो मैं सोंच भी नही सकता था। जब हम पहली बार मिले थे,तब मैं था ही क्या??केवल एक वेटर!!लेकिन जब एहसास हुआ कि वो मेरी ही खोज मे है तो हैरानी के साथ असीम ख़ुशी भी महसूस हुई। फिर भी मैंने निर्दयता से अपरिचय जताया। नियती की विडम्बना ही सही,लेकिन हम दोनो के वजूद का सम्मान अपरिचय बनाए रखने मेही था.,वरना पता नही उस मृगजल के धारा प्रवाह मे पतित हो हम किस ओर बह निकलते!!उबरना कितना मुश्किल होता!वक़्त उसे मरहम लगा ही देगा। वक़्त!!किसी भी डाक्टर से बड़ा डाक्टर!!
लेकिन सोंचता हूँ तो सिहर उठता हूँ!!मेरे प्रती इतनी गहरी आसक्ती रखते हुए,उसने अपने पती के साथ इतने साल कैसे बिताये होंगे!!अतीत को अनागत मे बदल ने के प्रयास मे क्या उसने अपना वर्तमान नही खोया होगा??मैंने तो शादी ही नही की। उन आखों की गिरफ्त मे गिरफ्तार मैं रिहा कब हुआ??लेकिन नीरा??
अच्छा हुआ इन फूलों का लिफाफा वो मेरे अस्पताल मे फेंक गयी। भगवान् करे इन फूलों के साथ,साथ वो अपनी संजोयी यादें भी फ़ेंक दे। वो यादें और ये नीरा के स्पर्शित फूल,अब मेरी धरोहर रहेंगे। शायद मेरे ना पहचाननेसे वो मुझ से नफरत ही करने लगी हो। लेकिन उसके लिए तो इस मोहमयी म्रुगत्रिश्ना से ये नफरत ही अच्छी। "
डाक्टर निरंजन ने अपनी डायरी मे बडे जतन से वो फूल रखे और धीरे से उसे उठा अपने सीने से लगा लिया। अनायास ही उनकी ऑंखें भर आयी।
सम्पूर्ण।

Thursday, July 26, 2007

प्यार की राह दिखा दुनियाको...

ये लेख मैंने तब लिखा था,जब गुजरात मे हुए फसांदों से मेरा मन तड़प उठा था....


कयी महीनो से मैं और आपलोग भी गुजरात मे घटी घटनायों का ब्योरा पढ़ रहे हैं । कोईभी तर्क संगत व्यक्ती जो घटा है या घट रहा है उस से सहमत नही हो सकता। इस मे कोई दो राय नही। अपनी अपनी ओर से कई लोगों ने जागृती लानेकी की कोशिश की,लेख लिखे गए तथा t.v.आदि के ज़रिये जागरुकता लाने का प्रयास हुआ। हिंदुस्तान मे क़ौमी फ़साद कोई पहली बार नही हुआ।
भिवंडी,मालेगाओ जैसी जगहें भी इन मामलों मे नाज़ुक मानी जाती हैं। मेरे बचपन मे मैंने जमशेद्पूर के क़ौमी फसादों के बारेमे किसीसे आँखों देखा हाल सुना था। छ:छ:महीनों के बच्चोंको ,ऊपरी मंजिलों से उनकी माँओं के सामने पटक दिया गया था,छोटे बच्चोंके सामने उनके माँ बाप को काट के जला दिया गया था।
इसी तरह स्थिती गुजरात मे हुई और हाल ही मे मेरी मुलाक़ात कुछ ऐसे लोगोंसे हुई जिन्होंने ये सबकुछ अपनी आँखोंसे देखा था,जो बच तो निकले, लेकिन इन सदमों के निशां ता उम्र नही भुला पाएंगे ! ये कैसा जुनून सवार हो जाता है इन्सानोपे जो हैवान भी कहलाने लायक नही रहते??क्यों होता है ऐसा??इनकी सद-असद विवेक बुद्धी कहॉ चली जाती है या होती ही नही??इनके मन मे कितना अंधियारा होता होगा!!क्या ऐसे लोगों को कभी भी पश्च्याताप होता होगा??क्या भविष्य मे अपनी मृत्यु शय्या पे पडे ये शांती से मर पाएँगे?? सुना है मन के हज़ारो नयन होते हैं, ये लोग देश की न्याय व्यवस्था से बच भी निकालें तो क्या अपने मन से बच पायेंगे ???आख़िर धर्म क्या है??इसकी परिभाषा क्या है?ऐसे सैकड़ों,हज़ारों सवाल मेरे मन मे डूबते उभरते रहते हैं ,जो इसकी तह तक जाने के लिए मुझे मजबूर करते हैं । ऐसेही कुछ ख़याल आपसे बाँटना चाहती हूँ।
बचपन मे अपनी सहेलियोंके घर जाया करती थी। उनके घर के बडे बुज़ुर्गोंको देखा करती थी। जब कभी उनके बुज़ुर्ग उन्हें आशीष देते थे तो मैंने कभी किसीके मुँह से ये नही सुना कि तुम इंसान बनो ,इस देश के अच्छे नागरिक बनो !!
मैंने लोगों को कयी सारे तीज त्यौहार मनाते देखा,ख़ूब ज़ोर शोर से देखा,लेकिन किसी को निजी तौर पे अपने घर मे स्वतंत्रता दिवस या फिर गणतंत्र दिवस मनाते नही देखा। ये दो दिन ऐसे बन सकते थे जो हर हिन्दुस्तानी एकसाथ मना सकता था,मिठाई बाँट सकता था,एक दुसरे को बधाई दे सकता था!!मैंने किसी माँ को अपने बच्चों से कहते नही सुना,"इस देश को रखना मेरे बच्चों संभल के..!"एक अच्छा नागरिक बनना क्या होता है,इसकी शिक्षा कितने घरोंसे बच्चों को दी जाती है??इस मंदिर मे जाओ,उस दर्गा पे जाओ। यहाँ मन माँगी मुराद पूरी होगी। बेटा इंजीनियर या डाक्टर बन जाये इसलिये मन्नतें माँगती माँओं को देखा,बेटी का विवाह अच्छे घर मे हो जाये ऎसी दुआएँ करते देखा(जिसमे कोई बुराई नही)लेकिन संतान विशाल र्हिदयी इन्सान बन जाये ऎसी दुआ कितने माता पिता करते है???
श्रीमद् भगवत गीतामे श्रीकृष्ण अर्जुनसे कहते हैं ,"हे भारत!(अर्जुन) जब,जब धर्म की ग्लानी होती है,तथा अधर्म का अभ्युत्थान होता है,तब,तब,धर्म की रक्षा करने के लिए तथा अधर्म का विनाश करने के लिए मैं जन्म लेता हूँ"। भगवन ने "हिंदु धर्मस्य ग्लानि "या "मुस्लिम धर्मस्य ग्लानी " ऐसा तो कहीं नही कहा!!इसी का मतलब है कि प्राचीन भारतीय भाषाओंमे "धर्म"शब्द का प्रयोग स्वभाव धर्म या निसर्ग के नियमोंको लेकर किया गया था, ना कि किसी जाती-प्रजाती को, जो मानव निर्मित है। इसका विवरण ऐसे कर सकते हैं , जैसे कि,अग्नी का "स्वभाव "धर्म है जलना और जलाना। निसर्ग के नियम सभी के लिए एक समान होते हैं। निसर्ग कहीं कोई भेद भाव नहीं करता।कडी धूप मे निकला व्यक्ती, चाहे वो कोयीभी हो,सूरज की तपिश से बच से पायेगा?क्या हिंदू को मलेरिया हो जाये तो उसकी दवाई कुछ और होगी और किसी मुस्लिम हो जाये तो उसकी कुछ और??
"मज़हब नही सिखाता आपस मे बैर रखना,हिंदी हैं हम,वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा",इसकी शिक्षा घर घर मे क्यों नही दी जाती ?ना हमारे घरोंमे दी जाती है ना हमारी पाठशालाओं में। बडे अफ़सोस के साथ ये कहना पडेगा तथा मान ना पडेगा।
जब मेरे बच्चे स्कूल तथा कालेज जाते थे और उनके सह्पाठियोंकी माँओं से मेरा मिलना होता था, तो चर्चा का विषय केवल बच्चोंकी पढ़ाई ,ट्यूशन और विविध परीक्षायों मिले मे अंकों को लेकर होता था। ज़िंदा रहने के लिए रोजी रोटी कमाना ज़रूरी है, इस बात को लेकर किसे इनकार है??लेकिन बच्चों के दिलों दिमाग़ मे भाई चारा और मानवता भर देना उतनाही ज़रूरी है। मैंने कयी मुहँ से सुना,"काश! अँगरेज़ हमे छोड़ के नही गए होते!!"मतलब अव्वल तो हम अपने घर मे चोरों को घुसने दें,फिर उन्हें अपना घर लूटने दें,और कहें कि वे घर मे ही घुसे रहते तो कितना अच्छा होता!!अपने आप को इस क़दर हतबल कर लें कि पराधीनता बेहतर लगे!!
चंद लोगोंके भड़काने से गर हम भड़क उठते हैं , एक दूसरे की जान लेनेपे अमादा हो जाते हैं,तो दोष हमारा भी है। कभी तो अपने अन्दर झाँके!!हम क्यों गुमराह होते चले जा रहे है??और तो और ,जो लोग हमे गुमराह करतें है,उन्हें ही हम अपने रहनुमा समझने लगते हैं !!कहाँ गए वो ढाई आखर प्रेम के??गुजरात की हालत देख कर क्यों कुछ लोगों को कहना पड़ा कि हमारी आँखें दुनिया के आगे शर्म से झुक गयी हैं??हमे हमारे हुन्दुस्तानी होने पे गर्व के बदले लानत महसूस हो रही है??क्या भारतकी प्राचीन सभ्यता केवल मंदिर -मस्जिद मे सिमटके रहती है??और दिलोंमे रहती है झुलसती हुई आग जो बार बार शोला बनके भड़क उठती है!!
"भाई को भाई काटेंगे,वायस श्रुगाल सुख लूटेंगे -"ये बात कवि दिनकर के "राष्मिरथी"इस महाकाव्यमे श्रीकृष्ण दुर्योधन को कहते हैं । यहाँ पड़ोसी ने पड़ोसियों को काटा और जिन्होंने सुख लूटा उनका यहाँ ज़िक्र कर के अपने कागज़ कलम गंदे नही करना चाहती।
जिनका आपसी विश्वास उठ गया है उसे लौटने मे कितनी सदियाँ लगेंगी ?हमारे देश के इतिहास मे और ऐसे कितने लानछनास्पद वाकयात घटेंगे ,जिसके पहले कि हमारी आँखें खुलेंगी ??क्या दुर्योधन की तरह हमारी भी मती मारी गयी है??जिन्होंने ये कुकर्म किये उन्हें बहे हुए लहू की गन्ध तंग नही करेगी? उनकी आंखों के आगेसे वो विध्वंसक दृश्य कभी हट पायेंगे?
जिन माताओं के सामने उनके बच्चोंको तड़पता हुआ मरने के लिए छोड़ दिया गया,क्या उन माताओंकी हाय इन हैवानो की आत्मा को कभी शांती मिलने देगी?क्या असहाय जीवों की हत्या करने मे इन लोगों को मर्दानगी का एहसास हुआ होगा??
मैंने कयी तथाकथित बुद्धीजीवों को इन क़ौमी फसादों का ज़िम्मेदार उस महान आत्मा को,जिस का नाम गांधी था,ठहराते हुए सुना है। ऐसे बुद्धीजीवीयों ने अपनी ज़िन्दगीमे अपनी ज़बान हिलाने के अलावा शायद ही कुछ और काम किया होगा। वो क्या समझें उस महात्मा को जिसने अपनी कुर्बानियों के बदले मे ना कोई तख़्त माँगा ना कोई ताज। "अमृत दिया सभी को मगर खुद ज़हर पिया ", कवी प्रदीप ने लिखा है। जिस दिन उस महात्मा की चिता जली होगी सच,महाकाल रोया होगा। ऐसे शांती और अहिंसा के पुजारी पे ऐसा घिनौना इलज़ाम लगाना असंवेदनशीलता की हद है।हैरानी तो इस बात की भी होती है कि, इस गौतम और गांधी के देश मे लोग इस तरह हिंसा पे अमादा हो जाते हैं!!!इस देश की तमाम माताओं से,भाई बहनों से मेरी हाथ जोडके विनती कि वे अपनी अपनी मान्यतायों के अलावा बच्चों को जैसे जनम घुट्टी पिलाई जाती है,उस तरह संदेश दे,"प्यार की राह दिखा दुनिया को ,रोके जो नफरत की आंधी!,तुममे ही कोई होगा गौतम,तुममे ही कोई होगा गांधी!"
ये हम सभी की ज़िम्मेदारी है। दुनिया की निगाहें हम पे हैं। देखना है, हम इसे किस तरह निभाते हैं। कोई मोर्चा नही ले जाना है,ना ही कोई भाषण देना है। आँखें मूँद के वो नज़ारा सामने लाने की कोशिश कीजिये जो गुजरात ने देखा होगा,वरना ये आँधी,ये बगूले,हम तक पोहोंचते देर ना लगेगी।
समाप्त

Tuesday, July 24, 2007

ऑंखें थक ना जाएँ !!

"

एक माँ के दर्द की कहानी,एक हमदर्द,औरत की ज़ुबानी!
हमारा कुछ साल पेहेले जब मुम्बई से पुणे तबादला हुआ तो मेरी बेटी वास्तुशाश्त्र के दूसरे साल मे पढ़ रही थी । सामान ट्रक मे लदवाकर जब हम रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हुए तो उसका मुरझाया हुआ चेहरा मेरे ज़हन मे आज भी ताज़ा है। हमने उसे मुम्बई मे ही छोड़ने का निर्णय लिया था। पेहेले पी.g.की हैसियत से और फिर होस्टल मे। उसे मुम्बई मे रेहेना बिलकुल भी अच्छा नही लगता था। वहांकी भगदड़ ,शोर और मौसम की वजह से उसे होनेवाली अलेर्जी ,इन सभी से वो परेशां रहती। पर उस वक़्त हमारे पास दूसरा चाराभी नही था।
जब हमने उस से बिदा ली तो मेरी माँ के अल्फाज़ बिजली की तरह मेरे दिमाग मे कौंध गए। सालो पूर्व जब वो मेरी पढ़ाई के लिए होस्टल मे छोड़ने आयी थी ,उन्होने अपनी सहेली से कहा था,"अब तो समझो ये हमसे बिदा हो गयी!जो कुछ दिन छुट्टियों मे हमारे पास आया करेगी,बस उतनाही उसका साथ। पढायी समाप्त होते,होते तो इसकी शादीही हो जायेगी।"
मेरे साथ ठीक ऐसाही हुआ था। मैंने झटके से उस ख़याल को हटाया । "नही अब ऐसा नही होगा। हमारा शायद वापस मुम्बई तबादला हो!शायद क्यों ,वहीं होगा!"लेकिन ऐसा नही हुआ।
वास्तुशाश्त्रके कोर्स मे उसे chhuttiyan
ना के बराबर मिलती थी,और उसका पुणे आनाही नही होता,नाही किसी ना किसी कारण वश मैं उस से मिलने जा पाती। देखते ही देखते साल बीत गए। मेरी लाडली वास्तु शात्रद्न बन गयी। हमारा पुणे से कही औरही तबादला हुआ,और हमे हमारे बेटे कोभी पढ़ाई के लिए पीछे छोड़ना पडा। इसी दरमियान मेरी बेटी ने आगे की पढ़ाई के वास्ते अमेरिका जाने का निर्णय ले लिया। मेरा दिल तो तभी बैठ गया था!मेरी माँ की बिटिया कमसे कम अपने देश मे तो थी!और हमारा कुछ ही महीनोमे और भी दूर तबादला हो गया। बेटाभी था उस से कही ज़्यादा दूर रह गया।
बिटिया अमेरिका जाने की तैय्यारियोंमे लगी रही।
और फिर वो दिन भी आही गया जब हम मुम्बई के आन्तर राष्ट्रीय हवायी अड्डे पे खडे थे। कुछ ही देर मे मेरी लाडली को एक हवायी जहाज़ दूर मुझ से बोहोत दूर उड़ा ले जाने वाला था। उस वक़्त उसकी आंखोंमे भविष्य के सपने थे। ये सपने सिर्फ अमेरिकामे पढ़ाई करने के नही थे। उनमे अब उसका भावी हमसफ़र भी शामिल था। उन दोनोकी मुलाक़ात जब मेरी बेटी तीसरे वर्ष मे थी तब हुई थी,और बिटिया का अमेरिका जानेका निर्णय भी उसीकी कारण था। मेरा भावी दामाद भविष्य मे वही नौकरी करनेवाला था। मेरी लाडली के नयन मे खुशियाँ चमक रही थी,और मेरी आँखोंसे कयी महीनोसे रोके गए आंसू रोके नही रूक रहे थे। वो अपने पंखोंसे खुले आसमान मे ऊंची उड़ान भरना चाहती थी,और मैं उसे अपने पंखोंमे समेटना चाह रही थी। मुझे मित्रगण पंछियोंका उदहारण देते है। उनके बच्चे कैसे पंख निकलते ही आकाश मे उड़ान लेते है,इतनाही नही बल्कि मादा उन्हें अपने घोंसले से उड्नेके लिए मजबूर करती है। लेकिन मुझे ये तुलना अधूरी सी लगती है। पंछी बार बार घोंसला बनाते है,अंडे देते है,उनके बच्चे निकलते है,लेकिन मेरे तो ये दो ही है। उनके इतने दूर उड़ जाने मे मेरा कराह ना लाजिम था।
मेरी लाडली सात समंदर पार चली गयी। हम वापस लॉट आये । सिर्फ दोनो। पति अपने काम मे बेहद व्यस्त। बड़ा सा चार शयन कक्शो वाला मकान। हर शयन कक्ष के साथ दो दो ड्रेसिंग रूम्स और स्नानगृह। चारो ओरसे बरामदोसे घिरा हुआ।
सात एकरोमे स्तिथ । ना अडोस ना पड़ोस।
मैं बेटे के कमरे मे गयी। मन अनायास भूत कालमे दौड़ गया। मेरे कानोमे मेरे छुट्को की आवाजे गूंजने लगी,उन्ही आवाजोमे मेरी आवाज़ भी ना जानू कब मिल गयी।
"माँ!देखो तो इसने मेरी यूनिफार्म पे गीला तौलिया लटकाया है,"मेरी बेटी चीख के शिक़ायत कर रही थी!"माँ!इसने बाथरूम मे देखो कितने बाल फैलाये है!छी!इसे उठाने को कहो"!बेटा शोर मचा रहा था!
" मुझे किसी की कोई बात नही सुन नी !चलो जल्दी !स्कूल बस आने मे सिर्फ पांच मिनट बचे है!उफ़!अभीतक वाटर बोतल नही ली!"मैं भी झुंझला उठी!!
"माँ!मेरी जुराबे नही मिल रही,प्लीज़ ढूँढ दो ना",बेटा इल्तिजा कर रहा था। "रखोगे नही जगह पे तो कैसे कुछ भी मिलेगा???"मैं भी चिढ़कर बोल रही थी।
अंत मे जब दोनो स्कूल जाते तो मेरी झुन्ज्लाहट कम होती। अब आरामसे एक प्याली चाय पी जाय !मुझ पगली को कैसे समझा नही कि एक बार मेरे पंछी उड़ गए तो ना जानू आखें इन्हें देखने के लिए कितनी तरस जायेंगी???
अब इस कमरे मे कितनी खामोशी थी!सब जहाँ के तहां !चद्दर पे कहीं कोई सिलवट नही!डेस्क पे किताबोंका बेतरतीब ढ़ेर नही !कुर्सी पर इस्त्री किये कपड़ों पर गीला तौलिया फेंका हुआ नही!अलमारी मे सबकुछ अपनी जगह!
"मेरा एकही जूता है!दूसरा कहॉ गया??मेरी टाई नही दिख रही!मेरी कम्पास मे रुलर नही है!किसने लिया??"बच्चों की ये घुली मिली आवाजे नही थी।" "तो मैं क्या कर सकती हूँ ???अपनी चीज़े क्यों नही सँभालते??"पलट के चिल्लानेवाली मैं खामोश खडी थी। सजे संवरे कामरोको देख के ईर्षा करनेवाली मैं.....अब मेरे सामने ऐसाही कमरा था!"लो ये तुम्हारा इश्तेहारवाला कमरा"!!!मेरे मन ने मुझे उलाहना दीं!तुम्हे यही पसंद था ना हमेशा!हाजिर है अब ये तुम्हारे लिए!सुबह उठोगी तो ये ऐसाही मिलेगा तुम्हे!"मुझे सिस्कियां आने लगी!

उस कमरे से निकल के मैं मेरी बिटियाके कमरेमे आयी। इतने दिनोसे पोर्टफोलियो के चक्कर मे बिखरे हुए कागजात,ऍप्लिकेशन फोर्म्स,साथ,साथ चल रही पैकिंग,और बिखरे हुए कपडे,अधखुली सूट केसेस ....अब कुछ भी नही था वहाँ....!मैंने घबराकर दोनो लैंप जला दिए!वो कुछ मुद्दत से बडे नियम से व्यायाम करती थी। उसने दीवार पे कुछ आसनों के पोस्टर लगा रखे थे......केवल वही उसके अस्तित्व की निशानी...खाली ड्रेसिंग टेबल (वैसे वो makeup तो इस्तेमाल नही करती थी).....ड्रेसिंग टेबल पे उसके कागज़ कलम ही पडे रहेते थे....पलंग पे फेंका दुपट्टा नही....हाँ अल्मारीके पास कोनेमे पडी उसकी कोल्हापुरी चप्पल ज़रूर थी। मैं सबको हमेशा बडे गर्व से कहती थी की मेरी बेटी मेरी सहेली की तरह है,हम ख़ूब गप लडाते है,आपसमे हंसी मजाक करते है,एकदूसरेके कपडे पेहेनते है। मुम्बई मे रेहेते हुए भी उसका परिधान सादगी भरा था। हाथ करघे का शलवार कुर्ता तथा कोल्हापुरी चप्पल।

उन्ही दिनोंकी,एक बड़ी ही मन को गुदगुदा देनेवाली घटना याद है मुझे। उसके क्लास की study tour जानेवाली थी । उसने मुझे बडेही इसरार के साथ रेलवे स्टेशन चलने को कहा . .मैं भी तैयार हो गयी। स्टेशन पोहोच के उनसे मुझे अपने क्लास के साथियोसे तथा उनके माता पिता जो वहाँ आये थे,उन सभीसे बडेही गर्व से मिलवाया। फिर मुझे शरारत भरी आखोंसे देखते हुए बोली,"माँ,अब तुम्हे जाना है तो जाओ। "

"क्यों??जब आही गयी हूँ तो मैं ट्रेन छूटने तक रूक जाती हूँ!"मैंने कहा।

"नही,जाओ ना!तुम्हें क्यों लायी थी ये लॉट के bataungee !" उसकी आंखों मे बड़ी चमक थी।

"ठीक है...तुम कहती हो तो जाती हूँ!" कहके मैं घर चली आयी। और उसके सफरसे लौटने का इंतज़ार करने लगी। वो जब लौटी स्टेशन वाली बात मुझे याद भी नही थी। अपने सफ़र के बारेमे बताते हुए उसने मुझ से कहा,"माँ तुम पूछोगी नही,केमैं तुम्हें स्टेशन क्यों ले गयी थी??"

"हाँ,हाँ बताओ,बताओ,क्यों ले गयी थी??" मैनेभी कुतूहल से पूछा!

वो बोली,"मुझे मेरे सारे क्लास को दिखाना था कि मेरी माँ कितनी नाज़ुक और खूबसूरत भी है! अभी तक उन्हों ने तुम्हारे talents के बारेमे ही सुन रखा था! हाँ ,तुम्हारे हाथ का खाना ज़रूर चखा था....पर तुम्हे देखा नही था!!जानती हो,जैसे ही तुम थोडी दूर गयी ,सारा क्लास मुझपे झपट पडा !सब kehane लगे ,अरी तुम्हारी माँ तो बेहद खूबसूरत है! तुम्हारी साडी और जूडेपे भी सब मर मिटे। "मेरे मन मे सच उस वक़्त जो खुशीकी लेहेर उठी ,मैं उसका कभी बयां नही कर सकती!हर बच्चे को अपनी माँ दुनिया शायद सब से सुन्दर माँ लगती होगी। लेकिन मेरी लाडली जिस विश्वास और अभिमान के साथ मुझे स्टेशन ले गयी थी,मुझे सच मे अपने आप को आईने मे देखने का मन किया!

मेरा मन और अधिक भूतकाल मे दौड़ गया। हमलोग तब भी मुम्बई मे ही थे। बेटी ने तभी तभी स्कूल जाना शुरू किया था। वो स्कूल बस से जाती थी। एक दिन स्कूल से मुझे फ़ोन आया। स्कूल बस गलती से उसे बिना लिए चली गयी थी। मैं तुरंत स्कूल दौड़ी । उसे ऑफिस मे बिठाया गया था। उसके एक गाल पे आँसू एक कतरा था। मैंने हल्केसे उसे पोंछ डाला,तो वो बोली,"माँ!मुझे लगा,तुम जल्दी नही आओगी,इसलिये पता नही कहॉ से ये पानी मेरी गाल पे आ गया।"

अब पीछे मुड़कर देखती हूँ ,तो लगता है,वो एक आँसू उसने मुझे दीं हुई सब से कीमती भेंट थी। काश! उसे मैं मोती बनाके किसी डिब्बी मे रख सकती!कुछ दिन पेहेले मैं अपने कैसेट प्लेयर पे रफी का gaayaa ,"बाबुल की दुआएँ लेती जा,"गाना सुन रही थी तो उसने झुन्ज्लाकर मुझ से कहा,"माँ!कैसे रोंदु गाने सुनती हो!इसीलिये तुम्हें डिप्रेशन होता है!"
एक और प्रसंग मुझे याद आया । तब हमलोग ठाने मे थे। बिटिया की उम्र कोई छ: साल की होगी। उसे उस वक़्त कुछ बडाही भयानक इन्फेक्शन हो गया।एक सौ चार -पांच तक का बुखार,मतली। उसे सुबह शाम इंजेक्शन लगते थे। इंजेक्शन देने दोक्टिओर आते तो नन्ही सी जान मुझे कहती,"माँ!तुम डरना मत!मुझे बिलकूल दर्द नही होता है!तुम दूसरी तरफ देखो। डाक्टर अंकल जब माँ दूसरी तरफ देखे तब मुझे इंजेक्शन देना,ठीक है?"मेरी आंखों मे आये आंसू छुपाने के लिए मैं अपना चेहरा फेर लेती!

वो जब थोडी ठीक हुई तो उस ने मुझसे नोट बुक तथा पेंसिल मांगी और मुझपे एक निहायत खूबसूरत निबंध लिख डाला!उसने लिखा,"जब मैं बीमारीसे उठी तो माँ ने मेरे बालोंमे हल्का-हल्का तेल लगाके कंघी की फिर चोटी बनाई। गरम पानीमे तौलिया दुबाके बदन पोंछा। फिर बोहोत प्यारी खुशबु वाला,मेरी पसंद का powder लगाया.जब मैं बीमार थी तब वो मुझे बड़ा गंदा खाना देतीं थी। लेकिन उसीसे तो मैं ठीक हुई!"ऐसा और बोहोत कुछ! मैं ख़ुशी से फूले ना समाई! वो निबंध मैंने उसकी teacher को पढने के लिए दिया और फिर वो मुझे वापस मिलाही नही! काश! मैंने उसकी इक कॉपी बनाके teacher को दीं होती! वो लेख तो एक बच्ची ने अपनी माँ को दिया हुआ अनमोल प्रशास्तिपत्रक था! एक नायाब tribute!!

अभी,अभी तक जब हम मुम्बई मे थे,वो मुझे देर रात बैठ के लंबे लंबे ख़त लिखती ,जिनमे अपने मनकी सारी भडास उंडेल देती!

पत्र के अंत मे दो चहरे बनाती,एक लिखने के पेहेलेका बड़ा दुखी सा,और एक मनकी शांती पाया हुआ,बडाही
सन्तुष्ट! उसे मेरे migraine के दर्द की हमेशा चिंता रहती।

आज हवायी अड्डे परका उसका चेहेरा याद करती हू तो दिलमे एक कसक्सी होती है!!लगता है एकबार तो उसकी अन्खोंमे मुझे,मुझसे इतना दूर जाता हुए हल्की सी नमी दिखती!!ऐसी नमी जो मुझे आश्वस्त करती के उसे अपनी माँ वहाभी याद आयेगी जितनी मुम्बई से आती थी!!काश! हवायी अड्डे परभी उसके गालपे जुदाई का सिर्फ एक आंसू लुढ़क आया होता जो मेरे कलेजेको ठंडक पोहोचाता ! एक मोती जो बरसों पेहेले मेरी इसी लाडली ने मुझे दिया था! जानती हूँ,उसका मेरे लिए लगाव,प्यार सब बरकारार है!फिरभी मेरी दिलने एक आश्वासन चाहा था!

मन फिर एकबार और एक बार बच्चों के बचपन मे दौड़ गया। हम उन दिनों aurangabadme थे । मेरा बेटा केवल दो साल का था। बड़ा प्यारासा तुतलाता था!एक रात मेरे पीछे पड़ गया,"माँ मुझे कहानी छुनाओ ना!,"उसने भोले पनसे मेरा आँचल खीचा। मैंने अपना आँचल छुडाते हुए कहा,"चलो अच्छे बच्चे बनके सो जाओ तो!!मुझे कितने काम करने है अभी!दादीमा

को खानाभी देना है!"

"तो छोटी वाली कहानी सुना दो ना!",उसने औरभी इल्तिजा भरा सुर मे कहा।

"तुम्हे पता है ना वो वी विली विन्की क्या करता है.....जो बच्चे अपनी माँ की बात नही सुनते,उनकी माँ को ही वो ले जाता है...बच्चों को पीछे ही छोड़ देता है"! कितनी भयानक बात मैंने मेरे मासूम से बच्चे को कह दीं! मुड़ के देखती हूँ तो अपनेआप को इतना शर्मिन्दा महसूस करती हूँ ,के बता नही सकती। सब कुछ छोड के एक दो मिनिट की कहानी क्यों नही सुनाई मैंने उसे?? कभी कभार ही तो वो चाहता था!

अब जब औरंगाबाद की स्मृतियां छा गईँ तो और एक बात याद आ गयी। ये बचपन से अंगूठा चूसता था और मेरी परिवार वाले मेरी पीछे पड़ जाते थे कि मैं उसकी ये आदत छुडाऊ !मुझे ख़ूब पता था कि ये आदत इसतरहा छुडाये नही छूटेगी लेकिन मैं उनके दवाव मे आही गयी। एक दिन उसे अपने पास ले बैठी और कहा,"देखो,तुम्हारी माँ अंगूठा नही चूसती,तुम्हारे बाबा नही चूसते.... "आदि,आदि अनेक लोगोंकी लिस्ट सुना दीं मैंने उसे...उसने अंगूठा मूहमे से निकाला,तो मुझे लगा,ओ वाक़ई इसपे मेरी बात का कुछ तो असर हुआ है!!अगलेही पल निहायत संजीदगी से बोला,"तो फिर उन छब को बोलो ना छूस्नेको!!".अंगूठा वापस मूहमे और सिर फिरसे मेरी गोदी मे !!..अकेलेमे भी कभी उसकी ये बात याद आती है है तो एक आंख हंसती है एक रोती है।

अभी,अभी कालेज मे भी रात मे अंगूठा चूसने वाला छुटका,सोनेसे पहले एक बार ज़रूर लाड प्यार करवाने के लिए मेरी गोदीमे सिर रखने वाला मेरा लाडला,परदेस रेहनेकी बात करेगा और मुझे उस से किसी भी सम्पर्क के लिए तरसना पडेगा...कभी दिमाग मे आयाही नही था....भूल गयी थी ये पंख मैनेही इन्हें दिए है......अब इनकी उड़ान पे मेरा कोई इख्तियार नही.....लेकिन दिलको कैसे समझाऊ??दोस्तोने फिर कहा, लोग तो बच्चे अमेरिका जाते हैं ,तो मिठाई बाँटते है.....तुम्हे क्या हो गया है????"सच मानो तो मेरा मूह कड़वा हो गया था.....!

फिर एकबार मन वर्तमान मे आ गया!!घर मे किस कदर सन्नाटा है....कंप्यूटर पे कौन बैठेगा इस बात पे झगडा नही,खाली पडा हुआ कंप्यूटर,कौनसा चॅनल देखना है टी.वी.पर,कोई बहस नही और कोई कुछ नही देखेगा ,कहके चिल्ला देने वाली मैं खामोश खडी..इतनी खामोशी के, मुझ से सही नही गयी......मैंने एक चैनल लगा दिया......मुझे घर मे कुछ तो आवाज़ चाहिए थी....मानवी आवाज़.....मेरे कितने ही छन्द थे.....लेकिन मुझे इसवक्त मेरे अपने मेरे अतराफ़ मे चाहिऐ थे......

मेरे बच्चो!जानती हूँ जीवन मूल्यों मे तेज़ी से बदलाव आ रहा है।! तुम्हारी पीढी के लिए भौगोलिक सीमा रेशायें नगण्य होती जा रही है!फिरभी कभी तो इस देश मे लॉट आना। यही भूमी तुम्हारी जन्मदात्री है। मेरी अत्माकी यही पुकार है। इस जन्म भूमी को तुम्हीने स्वर्ग से ना सही अमेरिका से बेहतर बनाना है!!मेरा आशीर्वाद तुम्हारे पीछे है और आँखें तुम्हारी वापसी के इंतज़ार मे!!कहीं ये थक ना जाएँ....गगन को छू लेनेवाले मेहेल और मांकी झोंपडी की ये टक्कर है......ऐसा ना हो के मेरे जीवन की शाम राह तकते तकते रात मे तबदील हो जाये....

समाप्त नम्र निवेदन:कृपया किसी भी लेखन का अन्यत्र उपयोग ना करें!

बोहोत दिनों बाद

बडे दिनों बाद मैंने ब्लॉग मे कुछ लिखने के लिए खोला है। वजह रही कुछ खराब तबियत। वैसे ऐसा नही के मैं इस काबिल ही नही थी कि कुछ लिख ही ना पायूं लेकिन सच तो ये है कि मन भी नही कर रहा था। कभी कम्पूटर खोल के बैठ भी जाती ,तो लगता ये भी कोई लिखने की बात है!इसे पढने मे किसे चाव होगा!!
फिर दिल को गहरायीसे टटोला । क्या आम और क्या खास??ये ज़िन्दगी है। ऐसेही चलेगी !और थोडा गहरा गयी तो उदासी कि वजह भी पता चली। मन ही मन मे जानती थी लेकिन बांटने से सकुचा रही थी। मुझे किसी एक खास व्यक्ती की e-मेल का हरवक्त इंतज़ार रहता था। एक ऐसा दौर था जब हम एकदम से एक दुसरे के करीब आ गए थे और फिर किसी गलत फेहमी के कारण हमारा सम्पर्क छूट गया। मैंने अपनी तरफसे जितनी भी e-मेल भेजी गलत फेहमी दूर करनेके लिए वो लॉट आने लगी। मैं बयाँ नही कर सकती मुझे कितनी तकलीफ होती रही ।
ना मैं किसी को अपना हाल बता सकती थी ना मेरा मुझ पे काबू रहा था। एक अजीब सा आलम था। मानो मुझ से किसी ने बेहद पेश कीमती चीज़ छीन ली हो और मैं आह तक ना कर पा रही हूँ!याद नही इसतरह कितने दिन बीते। नाही मेरे पास उस दोस्त का फ़ोन था और नाही पता!येभी आजकल की नेट्की खासियत है!ये नही कि मैंने पूछा नही था,लेकिन उसने मेरी हालत देख के टाल दिया था। ये सोंचा था कि ऐसी कोई बात मेरी मुश्किलें ना बढ़ा दे। लेकिन मुश्किलें तो अब बढ गयी थी मेरे लिए। मैं बेहद उदास हो गयी । हम दोनेके बीचका सम्पर्क
का सिलसिला नेट की आईडी की सभासद्त्व ता से शुरू हुआ था। अचानक एक दिन पर्सनल मेसेज बॉक्स का मुझे ध्यान आया। मैंने पेहेले तो घुस्सेमे आकर एक पत्र भेजा। जब उसकी याद्से मैं अपना पीछा नही छुडा पायी तो सीधा लिख दिया कि अपने दिलके हाथों मजबूर उसे लिख रही हूँ। फिरभी कोई जवाब नही। एकदिन बड़ा ही रूखा सा जवाब आया,जिसने मुझे रुला दिया। लेकिन मैनेभी अपनी ओरसे यत्न जारी रखा। जबतक की हम दोनोकोही ये महसूस नही हुआ कि इसमे नेट की गलती थी। उसने घुस्सेमे आके एक मेल ज़रूर लिखी थी लेकिन मेरी आईडी ब्लॉक नही की थी। लेकिन अब उसकी व्यस्तता बेहद बढ गयी है और मेरी ज़िंदगी कयी कारणों से ठेहेर सी गयी है। इंतज़ार अब भी मुझे बे सब्रीसे रहता है उसके पत्रोंका । अब भी बोहोत उदास हो जाती हू मेल बॉक्स मे उसका कोई मेल ना देख के। मुझे नही मालूम ये राह मुझे किस दिशामे ले जायेगी। इस रिश्तेका कोई अंजाम भी है या नही। क्या केवल दर्द के अलावा इसमेसे मुझे कुछ हासिल होगा भी या नही!!इतना इसवक्त ज़रूर जानती हूँ कि अबतक ये बेहद पाक साफ है। लेकिन एक अनजान्सी कशिश ज़रूर है इसमे। एक तड़प ज़रूर है जो कयी बार मुझे बेतहाशा रुला देती है। शायद उसके लिए इतनी ना हो। मेरा एक औरत होना इसका कारन हो सकता है। या फिर उसकी मसरूफियत और मेरा उसके बनिस्बत खालीपन!!कोई बता सकता है ये कैसा दौर है??मैंने ऎसी राह्पे कदम बढ़ा दिया है जिसकी कोई मंज़िल नही!लेकिन मुझसे ऐसा क्यो हुआ??

Wednesday, July 4, 2007

बोहोत सच बोल गयी....

बोहोत सच बोल गयी,
नासमझी की,और नही,
अब झूठ बोलती हूँ
यही समझ आये,
यही सोंचती हूँ!
कठ्गरेमे खडा किया
सवालों के घेरेमे
ईमान कर दिया,
तुम्हे क्या मिल गया?
दोस्तों,इल्तिजा है,
कुछ्तो रेहेम करो,
मेरी तफतीश करना
खुदा के लिए बंद करो!
भरे चौराहेपे मुझे
शर्मसार तो ना करो!
आज सरे आम,गुनाह
सारे कुबूल करती हूँ
की या नही की,
खतावार हूँ,हर खतापे
अपनी मुहर लगाती हूँ,
इकबालिया बयान देती हूँ!
सुनो ए गवाहो,
गौरसे सुनो,
जब बुलावा आये
भरी अदालातमे दुहाई देना
बिना पलक झपके
मेरे खिलाफ गवाही देना
बा इज़्ज़त बरी होने वालों
जाओ ज़िन्दगीका जश्न मनाओ
तुम्हारे दामन मे वो सारी
ख़ुशी हो
जिसकी तुमने तमन्ना की
तुम्हारी हर वो तमन्ना हो पूरी..

नम्र निवेदन:किसीभी लेखन का अनुकरण ना करे।

Tuesday, July 3, 2007

चराग के सायेमे .......

एक मजरूह रूह दिन एक
उड़ चली लंबे सफ़र पे,
थक के कुछ देर रुकी
वीरानसी डगर पे ।
गुज़रते राह्गीरने देखा उसे
तो हैरतसे पूछा उसे
'ये क्या हुआ तुझे?
ये लहूसा टपक रहा कैसे ?
नीरसा झर रहा कहाँसे?'
रूह बोली,'था एक कोई
जल्लाद जैसे के हो तुम्ही
पंख मेरे कटाये
हर दिन रुलाया, दिए ज़खम्भी
उस क़ैद से हू उड़ चली!
था रौशनी ओरोंके लिए,
बना रहनुमा हज़ारोंके लिए
मुझे तो गुमराह किया,
उसकी लौने हरदम जलाया
मंज़िलके निशां तो क्या,
गुम गयी राहभी!
किरनके लिए रही तरसती
ना जानू कैसे मेरे दिन बीते
कितनी बीती मेरी रांते
गिनती हो ना सकी
काले स्याह अंधेरेमे !
चल,जा,छोड़ मत छेड़ मुझे,
झंकार दूं मैं वो बीनाकी तार नही!
ग़र गुमशुदगीके मेरे
चर्चे तू सुने
कहना ,हाँ,मिली थी
रूह एक थकी हारी ,
साथ कहना येभी,
मैंने कहा था,मेरी
ग़ैर मौजूदगी
हो चर्चे इतने,
इस काबिल थी कभी?
खोजोगे मुझे,
कैसे,किसलिये?
मेरा अता ना पता कोई,
सब रिश्तोंसे दूर चली,
सब नाते तोड़ चली!
बरसों हुए वजूद मिटे
बात कल परसो की तो नही...

लेखीका की ओरसे नम्र निवेदन:किसीभी लेखन का बिना इजाज़त और कही इस्तेमाल ना करे।