आशाने एक पार्ट time और एक फुल time ऐसी दो औरते कामके लिया रखही ली थी। अस्मिता दादीका आँचल नही छोड़ती थी।
कुछ ही दिनोंमे मायाको बेटा हुआ। लड़केके नामोंकी लिस्ट बनी। 'कुशल' नाम सभीको अच्छा लगा। नामकरण हो गया। अस्मिता के सामने अगर आशा कुशलके लाड करती तो वो तूफान मचा देती। आशा और उसका पती दोनो तृप्त थे। ज़िंदगी उन्हें इतना कुछ देगी ऐसा कभी सोचाही नही था।
यथासमय संजूकाभी ब्याह हो गया। बादमे शुभदाभी बालरोग विशेषज्ञ हो गयी और उसकाभी एक विशिष्ट दैनिक क्रम शुरू हो गया। संजू-शुभदा उसी अस्पतालमे काम करने लगे जहाँ राजू करता था। बच्चे,बहुएँ आपसमे हिलमिलकर रहते, आशाने सबको एक डोरमे बाँध रखा था। सबने मिलकर घरको अन्दर बाहरसे सुन्दर बना रखा था। और फिर शुभदानेभी खुश खबरी सुनाई। उसे जुडवाँ बच्चे हुए। दोनो लड़के। इस कारण अस्मिता सभीकी औरभी लाडली हो गयी।
आशा हमेशा "दयाकी दृष्टी सदाही रखना..."गाना गुनगुनाया करती। कई बार राजू-संजू जब वो रसोयीमे होती और ये गाना गुनगुना रही होती तो उसके गलेमे बाहें डालकर कहते,"माँ,ऊपरवालेकी दया तो हैही लेकिन तेरी मेहनत कई गुना ज्यादा। उसके बिना ये दिन हमे देखने कोही नही मिलते।"
अब भी उसके कान्धोंको कोई स्पर्श कर रहा था। "राजू?संजू?" वो बुदबुदा रही थी।
"माजी!मैं लीलाबाई!चलिए,मैं आपको बाथरूम ले चलती हूँ। कुल्ला कीजिए,फिर चाय लीजिये,"व्रुधाश्रम मे खास आशाके लिए तैनात की गयी लीलाबाईने कहा।
"लीलाबाई? तू कौन??राजू,संजू कहाँ हैं??अभी तो मुझे पीछेसे आकर गले लगाया। कहाँ गए?,"आशाने कुछ न समझते हुए कहा।
"माँ जी,पहले उठिए तो। राजू, संजूको बादमे बुलाएँगे,"लीलाबाईने कहा।
नियतीकी कैसी विडम्बना थी! आशा वास्तव और कल्पना इसमेका फासला पूरी तरह भूल गयी थी। पिछले दो सालोंसे इस आश्रम मे पडी हुई थी। उसे तो आगे पढ़नेको भी नही मिला था। गराजमे काम करने वाले पतीने इजाज़त दीही नही थी। पती को पढ़नेका बिलकुल शौक नही था। उनको दो लड़के हुए थे ये वस्तुथिति थी। दोनो डाक्टर बने थे येभी वस्तुस्थिति । लेकिन किसतरह?ये अलग कहानी थी.......
आशा जिस स्कूलमे सफाई का काम करती थी, वहाँ की मुख्याध्यापिकाने उसके बच्चो की स्मार्टनेस देख ली और उसे एक अपत्यहीन ,बोहोत दौलतमंद,लेकिन उतनीही नेकदिल पारसी औरतके पास ले गयी।
"मैं बच्चों का सब खर्च करुँगी उन्हें बोहोत अच्छे बोर्डिंग स्कूलमे भरती करवा दूँगी बच्चे बोहोत होशियार है। उनका भविष्य उज्वल हो जाएगा। तुम्हे पछताना नही पड़ेगा,"उस दयालु पारसी औरत,मिसेज़ सेठना ने आशासे कहा।
आशाको क्या कहा जाय कुछ सूझ नही रहा था। क्या अपने पतीको पसंद आएगा ये सब? उनको छोडो, उसका मन लगेगा इन कलेजोंके टुकडों के बिना? वो स्तब्ध खडी हो गयी। बच्चे उसका आँचल थामे खडे थे। उस पारसी औरतका बड़ा-सा बंगला फटी-फटी आँखों से देख रहे थे।
अपूर्ण
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Sunday, October 21, 2007
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