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Monday, June 4, 2007

पहलेसे उजाले...

छोड़ दिया देखना कबसे
अपना आईना हमने!
बड़ा बेदर्द हो गया है,
पलट के पूछता है हमसे
कौन हो,हो कौन तुम?
पहचाना नही तुम्हे!
जो खो चुकी हूँ मैं
वही ढूंढता है मुझमे !
कहाँसे लाऊँ पहलेसे उजाले
बुझे हुए चेहरेपे अपने?
आया था कोई चाँद बनके
चाँदनी फैली थी मनमे
जब गया तो घरसे मेरे
ले गया सूरज साथ अपने!

निवेदन:कृपया बिना इजाज़त किसीभी लेखन का अन्यत्र इस्तेमाल ना करे।

Saturday, June 2, 2007

उनके नज़ारे...

जिनके नज़ारोंके लिए
हम तरसते रहे,
जब हुए वो नज़ारे
इतने डरावने हुए
उफ़ !कहते ना बने!
सोंचा था चारागर वो है
पुराने,जाने पहचाने
ज़ख्मोंपे मरहम करेंगे!
वो तो हरे घावोंपे
और खरोंचे दे गए!

निवेदन लेखिकाकी ओरसे: इस लेखन का कहीं भी दूसरी जगह बिना इजाज़त इस्तेमाल ना करें। ये कानूनन जुर्म है।