Friday, June 1, 2007

दूर रेह्केभी क्यो

दूर रेह्केभी क्यो
इतने पास रहते है वो?
हम उनके कोई नही
क्यो हमारे सबकुछ
लगते रहते है वो?
सर आंखों पे चढाया
अब क्यो अनजान
हम से बनते है वो?
वो अदा थी या
ये अलग अंदाज़ उनका
हमारी हर अदा क्यो
नज़र अंदाज़ करते है वो?
घर छोड़ा,शेहेर छोड़ा,
बेघर हुए परदेस गए
और क्या,क्या करे,
वोही कहे क्यो
पीछा करते है वो?
खुली आखोसे नज़र
नही आते कभी वो!
मूंदते ही पलकोको
सामने आते है वो?
कभी दिन मे ख्वाब दिखलाये,
अब क्यो कर कैसे,
नींदे भी हराम करते है वो?
शब् हमारी आखोमे गुज़रे
क्यो कर सपनोमे आएंगे वो?
सुना है अपने ख्वाबों
उनके ख्वाबोमे आती है जो?

Lekhika: Pls don't copy without prior permission.Its illegal.

शकीली बुनियादें

कभी शक बेबुनियाद निकले
कभी देखी शकीली बुनियादे
ऐसी जमीं कहॉ है,
जो खिसकी नही पैरोतले !
कभी खिसकी दसवें कदम पे
तो कभी कदम उठाने से पहले ॥

कृपया बिना इजाज़त कविताये कही और प्रकाशित ना करे। ये कानूनन जुर्म है।
लेखिका।

लुटेरे

हर बार लुट ने से पहेले सोंचा
अब लुट ने के लिए क्या है बचा?
पता नही कहॉ से खजाने निकलते गए?
मैं लुटती रही ,लुटेरे लूट ते गए!
हैरान हू,ये सब कैसे कब हुआ?
कहॉ थे मेरे होश जब ये सब हुआ?
अब कोई सुनवायी नही,
गरीबन !तेरे पास था क्या
जो कहती है लूटा गया,
कहके ज़माना चल दिया
मैं ठागीसी रह गयी
लुटेरा फिर आगे निकल गया...

कविताये बिना इजाज़त के छापना या कही और प्रसिद्ध करना कानूनन जुर्म है।
लेखिका.

दरख़्त ऊंचे थे...

तपती गरमीमे हमने देखे
अमलतास गुलमोहर
साथ खडे,पूरी बहारपे!
देखा कमाल कुदरत का,
घरकी छयामे खडे होके!
तपती गरमी मे देखे...

हमतो मुरझा गए थे
हल्की-सी किरण से!
बुलंद-ए हौसला कर के
खडे हुए हम धूप मे जाके!
तपती गरमी देखे...

दरख़्त खुदा के करिश्मे थे!
हम ज़मीं के ज़र्रे थे!
कैसे बराबरी की उनसे ?
वो हमसे कितने ऊँचे थे!
तपती गरमी मे देखे...

कहॉ हो?

कहॉ हो?खो गए हो?
पश्चिमा अपने आसमाके
लिए रंग बिखेरती देखो,
देखो, नदियामे भरे
है सारे रंग आस्मानके
किनारेपे रुकी हू कबसे
चुनर बेरंग है कबसे,
उन्डेलो भरके गागर मुझपे!
भीगने दो तन भी मन भी
भाग लू आँचल छुडाके,
तो खींचो पीछेसे आके!
होती है रात होने दो
आंखें मूंद्के मेरी पूछो
कौन हू?पहचानो मुझे!
जानती हु,खुद्से बाते
कर रही हू, इंतज़ार मे
खेलसा खेलती हू दिलसे,
हर पर्छायी लगे है
इस तरफ आ रही हो जैसे,
घूमेगी नही राह इस ओरसे
अब कभी भी तुम्हारी
जानकेभी नही हू मानती,
हो गयी हू पागलसी,
कहते सब पडोसी
पर किसके लिए हू हुई,
दुनिया हरगिज़ नही जानती...

राहे..

जिन राहोंकी मंज़िल नही
उनपे कदम रखना नही!
लौट्नेका मौका कभी
ऐसी राहोपे मिलता नही!
गलती राहोकी होती नही,
ये तो बेज़ुबान होती है
वरना चीख के आगाह करती
एक कदमभी आगे बढ़ना नही!

चिड़िया ग़र चुग जाये खेत....

सुना था मेरे बडोसे
चिड़िया ग़र चुग जाये
खेत,फायदा नही रोनेसे!
ये कहावत चली आयी
गुजरती हुई सदियोसे
ना भाषाका भेद
ना किसी देशकाही
खेत बोए गए,
पंछी चुगते गए
लोग रोते रहे
इतिहास गवाह है
सिलसिला थमा नही
चलताही रहा
चलताही रहा !