मैंने कलही एक लेख लिखा, किसीकी असंवेदन शीलतापे....तपशील अधिक नही दिए, क्योंकि पूरी बात जानना चाहती थी.....जो आज जानी। अब दिमाग थोडा ठंडा हुआ...वरना तिलमिला उठी थी.....!
" पुलिस वालों का मोटा पेट कहीं तो काम आया", ये वो अल्फाज़ मैंने मेरे बेहद क़रीबी व्याक्तिसे सुने, फोनेपे...ये व्यक्ति हमेशा सही बात बताता/बताती है। यही व्यक्ति इस मेह्कमेसे किसीके द्वारा जुडी हुई है। उनकी कठिनाईयाँ उसे ब-ख़ूबी पता हैं। जैसे आम लोग पुलिस के बारेमे बिना जाने कह देते हैं, या मीडिया और अखबार कहते हैं , उसे पूर्ण सत्य मान लेते हैं, उन्हीं मेसे एक निकली। अख़बार या मासिक पत्रिका मे छप गया तो वो पत्थरकी लकीर।
अफ़सोस की उस व्यक्तीने कोट करते समय , यही अल्फाज़ इस्तेमाल किए। और मैंने उसे मानके लिख दिया...असंवेदनशीलता तो थीही, लेकिन उस व्याकिके मस्तिष्क्मे।
एक आलेख था,' इंडिया टुडे' मे। उसके अल्फाज़ थे," मुम्बईके पुलिस मेहेकमे को , वहाँ कार्यरत सुरक्षा कर्मियों की,
उनके मोटापे को लेके चिंता करना छोड़ देनी चाहिए !सच तो ये है कि ऐसेही दस बारह पुलिस वालों का मिला जुला मोटापाही शायद कसबको पकड़नेमे काम आया! वो कसब जिसने CST और कामा अस्पताल मे ह्त्या काण्ड मचाया और भाग निकला।"
उसे ज़िंदा पकड़ना बेहद ज़रूरी था, ये उस निहत्ते इंस्पेक्टर को खूब अच्छी तरहसे पता था...AK ४७ । वो उसकी समयसूचकता थी...किसीका आर्डर नही था...अपनी जानपे खेलके उसने AK ४७ की नली अपने तरफ मोडके मज़बूती से पकड़ रखा...इसी कारन उसके साथियोंको मौक़ा मिला कसबको पकड़ लेनेका, और वोभी जिंदा। तुकाराम खुदके बचावमे बन्दूक घुमाके कसबको मार सकता था, या अन्य लोगोंको मरने दे सकता था...पर नही, उसने अपने देहकी एक दीवार बना दी...लाठी और ढृढ़ निश्चयके आगे कसब हार गया। मुम्बई पुलिसकी ये सबसे बड़ी उपलब्धि हुई।उसने अपनी इस बहदुरीके कारन कसबको आत्महत्या करनेसे रोक लिया गया । पूरी दुनिया मे बेमिसाल कर्तव्य परायणता , समयसूचकता और निर्भयता... ...!जो बात US के सु सज्ज कमान्डोस नही कर पाते, वो करिश्मा एक निहत्ते सुरक्षा करमीने कर दिखाया।
अव्वल तो यहाँ मोटापे का सन्दर्भ देनेकी ज़रूरत ही नही थी। ठीक है, ये लेखन स्वातंत्र्य हो गया ! छपी हुई किसीभी चीज़को आजभी लोग पत्थरकी लकीर मानतें हैं, चाहे वो अख़बार मे हो, पत्रिका मे हो या समाचार वाहिनियों पे हो..!
अब मै सबसे अधिक गलती उस व्यक्ती की कहूँगी, इस घटनाको लेके, जिसने मुझे ये बात फोनपे सुनाई। मेरी उस वक्त ये बेहेसभी हो गई कि, उनके विचारसे, कांस्टेबल आदि, सुबह व्यायामके लिए समय निकालही सकतें हैं...और कारन जो कुछ हो मोटा पेट ये सच है..! और मेरा कहना था कि उन्हें बन्दूक पकडनेकी तक ट्रेनिंग देनेकी मोहलत मिलती नही , ऐसे लोग कब तो योग करेंगे और कबतो अपनी ड्यूटी पे पोहोचेंगे...कितने पोलिस वाले कोईभी त्यौहार घरमे मन सकते हैं ? नही...दूसरे उसे सड़क पे खुले आम हुड दंग मचाते हुए मन सकें, इसलिए उन्हें तैनात होना पड़ता है। एकेक कांस्टेबल से लेके पोलिस आयुक तक गणेश विसर्जनके दिन ४८/ ४८ घंटें जगहसे हिल नही सकता...यही बात नवरात्रों मेभी ! बीच बीछ मे मंत्रीगण अपने श्रद्धा सुमन चढाने आ जाते हैं...तो उनके लिए तैनात रहो...! वो वर्दीधारी किस हद तक थक जाता होगा कभी जनताने सोचा है पलटके ?
लातूर के भयंकर विनास्शी भूकंप के बाद मल्बेमे कई लाशें दबी रही हुई थी। पोलिस की मददके लिए अर्म्य्को प्रचारण किया गया। वहाँ की लाशोंकी सड्नेकी बू सूँघ आर्मी ने ये काम करनेसे इनकार कर दिया। यही बात आंध्र प्रदेश मेभी हुई थी, जहाँ साइक्लोन के बाद सदी हुई लाशें पोलिस नही हटाई, आर्मी ने मना कर दिया।
ऐसे पोलिस कर्मियों के बारेमे उठाई ज़बान लगाई तालुको, ये आदत-सी पड़ गई है। जिस व्यक्तीने ये बात जो मुझे फोनपे सुनाई, उसकी आवाजमे वही हिकारत भरी हुई थी...अपने मोटे पेट तो इनसे संभाले जाते, ये अतिरेकियों क्या पकड़ पाएंगे....और जब अतिरेकी पकड़मे आए तो , दिल खोलके तारीफ करनेके बजाय अपने मनसे अर्थ निकाल लिया और सुना दिया...ये जानते हुए कि मै डॉक्युमेंटरी बनाने जा रही हूँ, सही डाटा, सही घटनायोंका ब्यौरा जमा कर रही हूँ, और उनके वक्ताव्य्को पेश कर सकती हूँ, उस व्यक्तीने सोच लेना चाहिए था...मैंने उसी वक्त उन से येभी कहा कि आपको पेपर का नाम, तारीख, किसने लिखा ये सब पता है तो बताया गया कि, उन्हों ने अबतक जो कहा है, उतना तो सही है, सिर्फ़ तारीख देखनी होगी।
आज जब उनसे बात हुई तो पाक्षिक था "इंडिया टुडे, टाईम्स ऑफ़ इंडिया नही...!लेखमे इस्तेमाल किए गए अल्फाज़ तो मुझे अब भी सही नही लगे, लेकिन जो अल्फाज़ उस व्यक्तीने निकाले, और अपने पूरे विश्वास साथ कहे, मै दंग रह गई, इतना कहना काफी नही...मै स्तब्ध हो गई....इस तरह का मतलब क्योँ निकाला उस व्यक्ती ने ? क्या हक़ बनता है, ऐसे समयमे, ऐसी बहादुरीसे लड़ी जंग, जहाँ अपना कर्तव्य, देशके प्रती, मूर्तिमंत बना खड़ा हो गया, कोईभी टिप्पणी कस देनेका ?
मुंबई मे एकेक कांस्टेबल को अपने कार्य स्थल पोहोचनेके लिए सुबह ५ बजे घरसे निकल जाना पड़ता है..कमसे कम २ घंटे, एक तरफ़ के , और कुछ ज़्यादा समय लौटते वक़्त। उसे सोने या खानेको वक़त नही मिलता वो व्यायाम कब करेगा ? बच्चे अपने पिताका दिनों तक मूह नही देख पाते...घरमे कोई बीमार हो तो उसकी ज़िम्मेदारी पत्नी पे आ पड़ती है। कैसा होता है उसका पारिवारिक जीवन, या कुछ होताभी है या नही ?घरमे बीमार माँ हो या बच्चे....उस व्यक्ती का कम मे कितना ध्यान लग सकता है??कमसे कम उनकी मेडिकल सेवाका तो कोई जिम्मेदार हो ! समाजको बस उनसे मांगना ही माँगना है, पलटके देना कुछ नही और एक शहीद्के बारेमे ऐसे अल्फाज़ के उसका मोटा पेट कहीं तो काम आया...!
आज मेरी गर्दन शरमसे गाडी जा रही है कि मैंने उस व्याक्तिपे इस क़दर विश्वास रखा और सुना हुआ असह्य लगा तो पाठकों के साथ बाँट लिया। खैर, ये तो सच है कि, उस व्यक्तीने अपने लेखमे तो इतना सीधा वार नही किया, जितनाकी उस मतलब निकालनेवाले वाले व्यक्तीने..!...! ऐसे लोगोंके लिए ईश्वरसे दुआ करती हूँ कि उन्हें हमेशा सन्मति मिले...!
कल जल्द बाज़ीमे की गई भूलके लिए हाथ जोडके माफ़ी चाहती हूँ। वादा रहा कि आइन्दा बिना दोबारा खुदकी तसल्ली किए बगैर मै कुछ नही लिखूँगी।
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Sunday, December 14, 2008
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