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Monday, June 4, 2007

पहलेसे उजाले...

छोड़ दिया देखना कबसे
अपना आईना हमने!
बड़ा बेदर्द हो गया है,
पलट के पूछता है हमसे
कौन हो,हो कौन तुम?
पहचाना नही तुम्हे!
जो खो चुकी हूँ मैं
वही ढूंढता है मुझमे !
कहाँसे लाऊँ पहलेसे उजाले
बुझे हुए चेहरेपे अपने?
आया था कोई चाँद बनके
चाँदनी फैली थी मनमे
जब गया तो घरसे मेरे
ले गया सूरज साथ अपने!

निवेदन:कृपया बिना इजाज़त किसीभी लेखन का अन्यत्र इस्तेमाल ना करे।

Saturday, June 2, 2007

उनके नज़ारे...

जिनके नज़ारोंके लिए
हम तरसते रहे,
जब हुए वो नज़ारे
इतने डरावने हुए
उफ़ !कहते ना बने!
सोंचा था चारागर वो है
पुराने,जाने पहचाने
ज़ख्मोंपे मरहम करेंगे!
वो तो हरे घावोंपे
और खरोंचे दे गए!

निवेदन लेखिकाकी ओरसे: इस लेखन का कहीं भी दूसरी जगह बिना इजाज़त इस्तेमाल ना करें। ये कानूनन जुर्म है।

बिरहन

खोयीसी बिरहन जब
उस ऊँचे टीलेपे
सूने महल के नीचे
या फिर खंडहर के पीछे
गीत मिलन के गाती है,
पत्थर दिल रूह भी
फूट फूट के रोती है।
हर वफ़ा शर्माती है
जब गीत वफ़ाके सुनती है।
खेतोमे,खालिहानोमे
अंधेरोंमे याकि
चांदनी रातोमे
सूखे तालाब के परे
या नदियाकी मौजोंपे
कभी जंगल पहाडोंमे
मीलों फैले रेगिस्तानोमे
या सागरकी लहरोंपे
जब उसकी आवाज़
लहराती है,
हर लेहेर थम जाती है
बिजलियाँ बदरीमे
छुप जाती हैं
हर तरफ खामोशी ही
खामोशी सुनायी देती है।
मेरी दादी कहती है
सुनी थी ये आवाजें
उनकीभी दादीने॥

All rights रेसेर्वेद
Shama

मुसाफिर..

सफरमे मुसाफिर मिलते है,
आपसमे पता पूछते है,
जब मंज़िल आती है,
अपनी दिशामे चल देते है!
पुर्ज़ेपे लिखा नामो पता
मरोड्के फेंक देते है!
रुकनेकी किसे फुर्सत है?
वो नाम,वो बांते,वो पता,
एक खेल ही तो होता!
सिर्फ दिल बेहलानेका
केवल ज़रिया भर होता,
अगले सफ़र मे दोहराया
बार बार है जाता,
हर बार नए मुसाफिर
हर एक को मिलते हैं
वही पुराना खेल
नए सिरेसे खेलते है...

लेखिका:बिना इजाज़त किसीभी लेखन का कँही और इस्तेमाल ना करे। ये कानूनन जुर्म है ।

खिलने वाली थी...

खिलनेवाली थी नाज़ुक सी
डालीपे नन्हीसी कली
सोंचा डालीने,ये कल होगी
अधखिली,परसों फूल बनेगी,
जब इसपे शबनम गिरेगी,
किरण मे सुनहरी सुबह की
ये कितनी प्यारी लगेगी!
नज़र लगी चमन के माली की,
सुबह से पहेले चुन ली गयी
खोके कोमल कलीको अपनी
सूख गयी वो हरी डाली॥

लेखिका:किसीभी लेखन का कहीँ और बिना इजाज़त इस्तेमाल ना करें। ये कानूनन गुनाह है।

Friday, June 1, 2007

डूबते हुये...

डूबते हुए हमे,वो लगे,
जैसे किनारे हो हमारे !
जितनेही पास गए,
वो उतनाही दूर गए,
वो भरम थे हमारे
वो कोई नही थे सहारे
उनके सामने हम डूबे
लगा,उन्हें पानीसे भय लगे!

लेखिका:लेखन का कहीभी किसीभी कारन बिना इजाज़त इस्तेमाल ना करे!

तूफान...

कुछ अरसा हुआ
एक तूफान मिला
ज़िंदगी के सब निशाँ
पूरी तरह मिटा गया
फिर वो थम भी गया
पर जीवन के कयी
भेद खोल गया!
आनेवाले कल के बारेमे
चुपके से आगाह कर गया !
हर तूफान से हर बार
मुझे खुद ही निपटना होगा
वो तूफान मुझे समझा गया!
फिर तो कयी तूफान
ज़िन्दगीमे आये गए,
बरबादीके सैंकड़ों निशाँ
कयी बार छोड़ गए
बार बार मुझे भी,
चूर,चूर कर गए,
पर हर बार फिर से
वही बात दोहरा गए,
अकेलेही चलना है तुम्हें
तूफान कान मे कह गए...

लेखिका:बिना इजाज़त लेखन का इस्तेमाल ना करें।

इस तरह आ..

सुन मौत!तू इसतरह आ
हवाका झोंका बन,धीरेसे आ!
ज़र्रे की तरह मुझे उठा ले जा
कोई आवाज़ हो ना
पत्ता कोई बजे ना
चट्टानें लाँघ के दूर लेजा !
किसीको पता लगे ना
डाली कोई हिले ना
आ,मेरे पास आ,
एक सखी बन के आ,
थाम ले मुझे
सीनेसे लगा ले,
गोदीमे सुला दे,
थक गयी हूँ बोहोत,
मीठी सी लोरी,
गुनगुना के सुना दे!
मेरी माँ बन के आ ,
आँचल मे छुपा ले !

लेखिका:इस लेखन का बिना इजाज़त कहीं और chhapaayee के के लिए इस्तेमाल ना करे। ये कानूनन गुनाह है।

आंखें ...

आंखें भी क्या चीज़
होती है ,
सोंचा है कभी?
मुस्कुराना चाहू तो
नम होती है!
दर्द छुपाने के लिए
हँस भी देती है!
खुद तमाशा बनती है,
देखती है बनके तमाशायी
कुदरत का करिश्मा हैं
इसे रोकनेवाला धरा पे
पैदाभी हुआ कोई?

लेखिका की ओरसे :बिना इजाज़त कहींभी इस लेखन की छपाई ना करे. कानूनन गुनाह है।

मुकम्मल जहाँ ...

मैंने कब मुकम्मल जहाँ माँगा?
जानती हूँ नही मिलता!
मेरी जुस्तजू ना मुमकिन नहीं !
अरे पैर रखनेको ज़मीं चाही
पूरी दुनिया तो नही मांगी?



कविता या और कोयीभी लेखन का बिना इजाज़त और इस्तेमाल ना करे। ये कानूनन जुर्म है।

दूर रेह्केभी क्यो

दूर रेह्केभी क्यो
इतने पास रहते है वो?
हम उनके कोई नही
क्यो हमारे सबकुछ
लगते रहते है वो?
सर आंखों पे चढाया
अब क्यो अनजान
हम से बनते है वो?
वो अदा थी या
ये अलग अंदाज़ उनका
हमारी हर अदा क्यो
नज़र अंदाज़ करते है वो?
घर छोड़ा,शेहेर छोड़ा,
बेघर हुए परदेस गए
और क्या,क्या करे,
वोही कहे क्यो
पीछा करते है वो?
खुली आखोसे नज़र
नही आते कभी वो!
मूंदते ही पलकोको
सामने आते है वो?
कभी दिन मे ख्वाब दिखलाये,
अब क्यो कर कैसे,
नींदे भी हराम करते है वो?
शब् हमारी आखोमे गुज़रे
क्यो कर सपनोमे आएंगे वो?
सुना है अपने ख्वाबों
उनके ख्वाबोमे आती है जो?

Lekhika: Pls don't copy without prior permission.Its illegal.

शकीली बुनियादें

कभी शक बेबुनियाद निकले
कभी देखी शकीली बुनियादे
ऐसी जमीं कहॉ है,
जो खिसकी नही पैरोतले !
कभी खिसकी दसवें कदम पे
तो कभी कदम उठाने से पहले ॥

कृपया बिना इजाज़त कविताये कही और प्रकाशित ना करे। ये कानूनन जुर्म है।
लेखिका।

लुटेरे

हर बार लुट ने से पहेले सोंचा
अब लुट ने के लिए क्या है बचा?
पता नही कहॉ से खजाने निकलते गए?
मैं लुटती रही ,लुटेरे लूट ते गए!
हैरान हू,ये सब कैसे कब हुआ?
कहॉ थे मेरे होश जब ये सब हुआ?
अब कोई सुनवायी नही,
गरीबन !तेरे पास था क्या
जो कहती है लूटा गया,
कहके ज़माना चल दिया
मैं ठागीसी रह गयी
लुटेरा फिर आगे निकल गया...

कविताये बिना इजाज़त के छापना या कही और प्रसिद्ध करना कानूनन जुर्म है।
लेखिका.

कहॉ हो?

कहॉ हो?खो गए हो?
पश्चिमा अपने आसमाके
लिए रंग बिखेरती देखो,
देखो, नदियामे भरे
है सारे रंग आस्मानके
किनारेपे रुकी हू कबसे
चुनर बेरंग है कबसे,
उन्डेलो भरके गागर मुझपे!
भीगने दो तन भी मन भी
भाग लू आँचल छुडाके,
तो खींचो पीछेसे आके!
होती है रात होने दो
आंखें मूंद्के मेरी पूछो
कौन हू?पहचानो मुझे!
जानती हु,खुद्से बाते
कर रही हू, इंतज़ार मे
खेलसा खेलती हू दिलसे,
हर पर्छायी लगे है
इस तरफ आ रही हो जैसे,
घूमेगी नही राह इस ओरसे
अब कभी भी तुम्हारी
जानकेभी नही हू मानती,
हो गयी हू पागलसी,
कहते सब पडोसी
पर किसके लिए हू हुई,
दुनिया हरगिज़ नही जानती...

राहे..

जिन राहोंकी मंज़िल नही
उनपे कदम रखना नही!
लौट्नेका मौका कभी
ऐसी राहोपे मिलता नही!
गलती राहोकी होती नही,
ये तो बेज़ुबान होती है
वरना चीख के आगाह करती
एक कदमभी आगे बढ़ना नही!

चिड़िया ग़र चुग जाये खेत....

सुना था मेरे बडोसे
चिड़िया ग़र चुग जाये
खेत,फायदा नही रोनेसे!
ये कहावत चली आयी
गुजरती हुई सदियोसे
ना भाषाका भेद
ना किसी देशकाही
खेत बोए गए,
पंछी चुगते गए
लोग रोते रहे
इतिहास गवाह है
सिलसिला थमा नही
चलताही रहा
चलताही रहा !

Wednesday, May 30, 2007

मजरूह रूह..

एक मजरूह रूह,दिन एक,
उड़ चली लंबे सफ़र पे
थक के कुछ देर रुकी
इक वीरान सी डगर पे
गुजरते राह्गीरने देखा उसे
तो हैरत से पूछा उसे,
'ये क्या हुआ तुझे?
लहू टपक रहा है कैसे
ये नीर झर रहा कहाँ से ?'
रूह बोली,था एक कोई
जल्लाद,जैसे हो तुम्ही!
पंख मेरे जलाए
दिल किया छलनी
कैद्से हूँ उड़ चली!
था रौशनी औरोके लिए
पथदीप हज़ारोंके लिए!
मुझे गुमराह किया
लौने हरवक्त जलाया (अपूर्ण)

कीमत खुशीकी...

हर हंसीकी कीमत
अश्कोंसे चुकायी हमने
पता नही और कितना
कर्ज़ रहा है बाक़ी
आंसू है कि थमते नही!
जिन्हे खोके हम रोये
जिनकी खातिर तनहा हुए
वो कहॉ है येभी
अब हमे खबर नही
हाथ उनके लिए
उठते है अब भी
दुआ दिलसे निकलती
है अब भी उनके लिए!
पलके मून्द्केभी
नींदे है उड़ जाती
वीरान बस्तीमे दिलकी
वो बस्ते है आजभी!
दिलने ऐसे बंद किये
दरवाज़े,कि ना वो है
निकल पाते,नाही,
दूसरा आये कोई
येभी गुंजाईश नही !
हैरत तो ये है,
दूरसेभी हमारी कैसी
ख़ूब खबर लेते है,
हमारी हंसीपे पहेरे
उनके लगे है
आये तो सही होटोंपे
gam
पासहीमे रहेते है
हल्कीसी क्यो ना हो
हर हंसी झपट लेते है!

हकीकत नही तो ना सही....

किसीके लिए मैं हकीकत नही
तो ना सही !
हू मेरे माज़िकी पर्छायी ,
चलो वैसाही सही !
जब ज़मानेने मुझे
क़ैद करना चाहा
मैं बन गयी एक साया,
पेहचान मुकम्मल मेरी
कोई नही तो ना सही !
रंग मेरे कयी
रुप बदले कयी
किसीकी हू सहेली
किसीके लिए पहेली
हू गरजती बदरी
या किरण धूपकी
मुझे छू ना पाए कोई,
मुट्ठीमे बंद करले
मैं वो खुशबू नही.
जिस राह्पे हू निकली
वो निरामय हो मेरी
इतनीही तमन्ना है.
गर हो हासिल मुझे
बस उतनीही जिन्दगी
जलाऊं अपने हाथोंसे
झिलमिलाती शमा
झिलमिलाये जिससे
एक आंगन,एकही जिन्दगी.
रुके एक किरण उम्मीद्की
कुछ देरके लियेही सही
शाम तो है होनीही
पर साथ लाए अपने
एक सुबह खिली हूई
र्हिदय मेरा ममतामयी
मेरे दमसे रौशन वफा
साथ थोड़ी बेवाफायिभी
जीवनमे पूरे, कयी
सारे चहरे मेरे,
ओढ़े कयी नकाब भी
अस्मत्के लिए मेरी
था येभी ज़रूरी
पहचाना मुझे?
मेरा एक नाम तो नही...