Thursday, November 27, 2008

मेरी आवाज़ सुनो !

आज अपनी श्रृंखला छोड़ एक पुकार लेके आयी हूँ...एक पीडामे डूबी ललकार सुनाना चाहती हूँ...एक आवाहन है.....अपनी आवाज़ उठाओ....कुछ मिलके कहें, एकही आवाज़ मे, कुछ करें कि आतंकवादी ये न समझे, उनकी तरह हमभी कायर हैं.....अपनेआपको बचाके रख रहे हैं...और वो मुट्ठीभर लोग तबाही मचा रहे हैं.....हम तमाशबीनोंकी तरह अपनीही बरबादीका नज़ारा देख रहे हैं !एक भीनी, मधुर पर सशक्त झंकार उठे....अपने मनकी बीनासे...पता चले इन दरिन्दोंको की हमारी एकता अखंड है...हमारे दिलके तार जुड़े हुए हैं....!
एक चीत्कार मेरे मनसे उठ रही है....हम क्यों खामोश हैं ? क्यों हाथ पे हाथ धरे बैठे हैं ? कहाँ गयी हमारी वेदनाके प्रती संवेदनशीलता??? " आईये हाथ उठाएँ हमभी, हम जिन्हें रस्मों दुआ याद नही, रस्मे मुहोब्बतके सिवा, कोई बुत कोई ख़ुदा याद नही..."!अपनी तड़प को मै कैसे दूर दूरतक फैलाऊँ ? ?क्या हम अपाहिज बन गए हैं ? कोई जोश नही बचा हमारे अन्दर ? कुछ रोज़ समाचार देखके और फिर हर आतंकवादी हमलेको हम इतिहासमे दाल देते हैं....भूल जाते हैं...वो भयावह दिन एक तारीख बनके रह जाते हैं ?अगले हमले तक हम चुपचाप समाचार पत्र पढ़ते रहते हैं या टीवी पे देखते रहते हैं...आपसमे सिर्फ़ इतना कह देते हैं, "बोहोत बुरा हुआ...हो रहा...पता नही अपना देश कहाँ जा रहा है? किस और बढ़ रहा है या डूब रहा है?" अरे हमही तो इसके खेवनहार हैं !
अपनी माता अपने शहीदोंके, अपने लड़लोंके खूनसे भीग रही है.....और हम केवल देख रहे हैं या सब कुछ अनदेखा कर रहे हैं, ये कहके कि क्या किया जा सकता है...? हमारी माँ को हम छोड़ कौन संभालेगा? कहाँ है हमारा तथाकथित भाईचारा ? देशका एक हिस्सा लहुलुहान हो रहा है और हम अपने अपने घरोंमे सुरक्षित बैठे हैं ?

कल देर रात, कुछ ११/३० के करीब एक दोस्तका फ़ोन आया...उसने कहा: तुम्हारी तरफ़ तो सब ठीक ठाक हैना ? कोई दंगा फसाद तो नही?
मै :" ऐसा क्यों पूछ रहे हैं आप ? कहीँ कुछ फ़साद हुआ है क्या?"
वो :" कमाल है ! तुमने समाचार नही देखे?"
मै :" नही तो....!
वो : " मुम्बईमे ज़बरदस्त बम धमाके हुए जा रहे हैं...अबके निशानेपे दक्षिण मुंबई है....."
मैंने फ़ोन काट दिया और टीवी चला दिया...समाचार जारी थे...धमाकोंकी संख्या बढ़ती जा रही थी ...घायलोंकी संख्यामे इज़ाफा होता जा रहा था, मरनेवालों की तादात बढ़ती जा रही थी....तैनात पोलिस करमी और उनका साक्षात्कार लेनेके लिए बेताब हो रहे अलग, अलग न्यूज़ चॅनल के नुमाइंदे...पूछा जा रहा था रघुवंशीसे( जिन्हें मै बरसों से जानती हूँ...एक बेहद नेक और कर्तव्यतत्पर पोलिस अफसर कहलाते हैं। वर्दीमे खड़े )...उनसे जवाबदेही माँगी जा रही थी," पोलिस को कोई ख़बर नही थी...?"
मुझे लगा काश कोई उन वर्दी धारी सिपहियोंको शुभकामनायें तो देता....उनके बच्चों, माँ ओं तथा अन्य परिवारवालोंका इस माध्यमसे धाडस बंधाता...! किसीकेभी मन या दिमाग़मे ये बात नही आयी॥? इसे संवेदन हीनता न कहें तो और क्या कहा जा सकता है ? उन्हें मरनेके लिए ही तो तनख्वाह दी जा रही है! कोई हमपे एहसान कर रहें हैं क्या??कहीँ ये बात तो किसीके दिमागमे नही आयी? गर आयी हो तो उससे ज़्यादा स्वार्थी, निर्दयी और कोई हो नही सकता ये तो तय है।
गर अंदेसा होता कि कहाँ और कैसे हमला होगा तो क्या महकमा ख़ामोश रहता ?सन १९८१/८२मे श्री. धरमवीर नामक, एक ICS अफसरने, नेशनल पोलिस कमिशन के तेहेत कई सुझाव पेश किए थे....पुलिस खातेकी बेह्तरीके लिए, कार्यक्षमता बढानेके लिए कुछ क़ानून लागू करनेके बारेमे, हालिया क़ानून मे बदलाव लाना ज़रूरी बताया था। बड़े उपयुक्त सुझाव थे वो। पर हमारी किसी सरकार ने उस कमिशन के सुझावोंपे गौर करनेकी कोई तकलीफ़ नही उठाई !सुरक्षा कर्मियोंके हाथ बाँधे रखे, आतंकवादियोंके पास पुलिसवालोंके बनिस्बत कई गुना ज़्यादा उम्दा शत्र होते, वो गाडीमे बैठ फुर्र हो जाते, जबकि कांस्टेबल तो छोडो , पुलिस निरीक्षक के पासभी स्कूटर नही होती ! २/३ साल पहलेतक जब मोबाईल फ़ोन आम हो चुके थे, पुलिस असफरोंको तक नही मुहैय्या थे, सामान्य कांस्टेबल की तो बात छोडो ! जब मुहैय्या कराये तब शुरुमे केवल मुम्बईके पुलिस कमिशनर के पास और डीजीपी के पास, सरकारकी तरफ़ से मोबाइल फोन दिए गए। एक कांस्टबल की कुछ समय पूर्व तक तनख्वाह थी १५००/-.भारतीय सेनाके जवानोंको रोजाना मुफ्त राशन मिलता है...घर चाहे जहाँ तबादला हो मुहैय्या करायाही जाता है। बिजलीका बिल कुछ साल पहलेतक सिर्फ़ रु. ३५/- । अमर्यादित इस्तेमाल। बेहतरीन अस्पताल सुविधा, बच्चों के लिए सेंट्रल स्कूल, आर्मी कैंटीन मे सारी चीज़ें आधेसे ज़्यादा कम दाम मे। यक़ीनन ज़्यादातर लोग इस बातसे अनभिद्न्य होंगे कि देशको स्वाधीनता प्राप्त होनेके पश्च्यात आजतलक आर्मीके बनिसबत ,पुलिस वालोंकी अपने कर्तव्य पे तैनात रहते हुए, शहीद होनेकी संख्या १० गुनासे ज़्यादा है !आजके दिन महानगरपलिकाके झाडू लगानेवालेको रु.१२,०००/- माह तनख्वाह है और जिसके जिम्मे हम अपनी अंतर्गत सुरक्षा सौंपते हैं, उसे आजके ज़मानेमे तनख्वाह बढ़के मिलने लगी केवल रु.४,०००/- प्रति माह ! क्यों इतना अन्तर है ? क्या सरहद्पे जान खोनेवालाही सिर्फ़ शहीद कहलायेगा ? आए दिन नक्षल्वादी हमलों मे सैंकडो पुलिस कर्मचारी मारे जाते हैं, उनकी मौत शहादत मे शुमार नही?उनके अस्प्ताल्की सुविधा नही। नही बछोंके स्कूल के बारेमे किसीने सोचा। कई बार २४, २४ घंटे अपनी ड्यूटी पे तैनात रहनेवाले व्यक्तीको क्या अपने बच्चों की , अपने बीमार, बूढे माँ बापकी चिंता नही होती होगी?उनके बच्चे नही पढ़ लिख सकते अच्छी स्कूलों मे ?
मै समाचार देखते जा रही थी। कई पहचाने और अज़ीज़ चेहरे वर्दीमे तैनात, दौड़ भाग करते हुए नज़र आ रहे थे...नज़र आ रहे थे हेमंत करकरे, अशोक आमटे, दाते...सब...इन सभीके साथ हमारे बड़े करीबी सम्बन्ध रह चुके हैं। महाराष्ट्र पुलिस मेह्कमेमे नेक तथा कर्तव्य परायण अफ्सरोंमे इनकी गिनती होती है। उस व्यस्ततामेभी वे लोग किसी न किसी तरह अख़बार या समाचार चैनलों के नुमाइंदोंको जवाब दे रहे थे। अपनी जानकी बाज़ी लगा दी गयी थी। दुश्मन कायरतासे छुपके हमला कर रहा था, जबकि सब वर्दीधारी एकदम खुलेमे खड़े थे, किसी इमारतकी आड्मे नही...दनादन होते बम विस्फोट....दागी जा रही गोलियाँ...मै मनही मन उन लोगोंकी सलामतीके लिए दुआ करती रही....किसीभी वार्ताहरने इन लोगोंके लिए कोई शुभकामना नही की...उनकी सलामतीके लिए दुआ करें, ऐसा दर्शकों को आवाहन नही दिया!
सोचो तो ज़रा...इन सबके माँ बाप बेहेन भाई और पत्निया ये खौफनाक मंज़र देख रही होंगी...! किसीको क्या पता कि अगली गोली किसका नाम लिखवाके आयेगी?? किस दिशासे आयेगी...सरहद्पे लड़नेवालोंको दुश्मनका पता होता है कि वो बाहरवाला है, दूसरे देशका है...लेकिन अंतर्गत सुरक्षा कर्मियोंको कहाँसे हमला बोला जाएगा ख़बर ही नही होती..!

मुझे याद आ रहा था वो हेमंत करकरे जब उसने नयी नयी नौकरी जोइन की थी। हम औरंगाबादमे थे। याद है उसकी पत्नी...थोड़ी बौखलाई हुई....याद है नासिक मे प्रशिक्षण लेनेवाला अशोक और दातेभी...वैसे तो बोहोत चेहरे आँखोंकी आगेसे गुज़रते जा रहे थे। वो ज़माने याद आ रहे थे...बड़े मनसे मै हेमंतकी दुल्हनको पाक कला सिखाती थी( वैसे बोहोतसे अफसरों की पत्नियोंको मैंने सिखाया है.. और बोहोत सारी चीजोंसे अवगत कराया है। खैर)औपचारिक कार्यक्रमोंका आयोजन करना, बगीचों की रचना, मेज़ लगना, आदी, आदी....पुलिस अकादमी मे प्रशिक्षण पानेवाले लड़कोंको साथ लेके पूरी, पूरी अकादेमी की ( ४०० एकरमे स्थित) landscaping मैंने की थी....!ये सारे मुझसे बेहद इज्ज़त और प्यारसे पेश आते...गर कहूँ कि तक़रीबन मुझे पूजनीय बना रखा था तो ग़लत नही होगा...बेहद adore करते ।
इन लोगोंको मै हमेशा अपने घर भोजनपे बुला लिया करती। एक परिवारकी तरह हम रहते। तबादलों के वक़्त जब भी बिछड़ते तो नम आँखों से, फिर कहीँ साथ होनेकी तमन्ना रखते हुए।
रातके कुछ डेढ़ बजेतक मै समाचार देखती रही...फिर मुझसे सब असहनीय हो गया। मैंने बंद कर दिया टीवी । पर सुबह ५ बजेतक नींद नही ई....कैसे, कैसे ख्याल आते गए...मन कहता रहा, तुझे कुछ तो करना चाहिए...कुछ तो...

सुबह १० बजेके करीब मुम्बईसे एक फ़ोन आया, किसी दोस्तका। उसने कहा: "जानती हो न क्या हुआ?"
मै :"हाँ...कल देर रात तक समाचार देख रही थी...बेहद पीड़ा हो रही है..मुट्ठीभर लोग पूरे देशमे आतंक फैलाते हैं और..."
वो:" नही मै इस जानकारीके बारेमे नही कह रहा....."
मै :" तो?"
वो :" दाते बुरी तरहसे घायल है और...और...हेमंत और अशोक मारे गए...औरभी न जाने कितने..."
दिलसे एक गहरी आह निकली...चंद घंटों पहले मैंने और इन लोगोंके घरवालोने चिंतित चेहरोंसे इन्हें देखा होगा....देखते जा रहे होंगे...और उनकी आँखोंके सामने उनके अज़ीज़ मारे गए.....बच्चों ने अपनी आँखोंसे पिताको दम तोड़ते देखा...पत्नी ने पतीको मरते देखा...माँओं ने , पिताने,अपनी औलादको शहीद होते देखा...बहनों ने भाईको...किसी भाई ने अपने भाईको...दोस्तों ने अपने दोस्तको जान गँवाते देखा....! ये मंज़र कभी वो आँखें भुला पाएँगी??
मै हैरान हूँ...परेशान हूँ, दिमाग़ काम नही कर रहा...असहाय-सि बैठी हूँ.....इक सदा निकल रही दिलसे.....कोई है कहीँ पे जो मेरा साथ देगा ये पैगाम घर घर पोहचाने के लिए??हमारे घरको जब हमही हर बलासे महफूज़ रखना पड़ता है तो, हमारे देशको भी हमेही महफूज़ बनाना होगा....सारे मासूम जो मरे गए, जो अपने प्रियजनोको बिलखता छोड़ गए, उनके लिए और उनके प्रियाजनोको दुआ देना चाहती हूँ...श्रद्धा सुमन अर्जित करना चाहती हूँ...साथ कुछ कर गुज़रनेका वादाभी करना चाहती हूँ....!या मेरे ईश्वर, मेरे अल्लाह! मुझे इस कामके लिए शक्ती देना.....

32 comments:

RAJ SINH said...

'shama' ek insan hai jise main janta hoon . vah aapke har shabd aur samvedna me aapke sath hai . saath hai !

vo main hoon !

Poonam Agrawal said...

Shamaji! aapka lekhan damdaar hai...insaaniyat ka paath padhata hai...ek dard hai masoomo ke liye aapke man main ....ek insaan hi doosre insan ka dard samajh sakta hai...aapki ye post vakai bahu achchi hai...

Akshaya-mann said...

बिल्कुल सही प्रकाश डाला है शमा जी ने
हमारे सिपाहियों को मिलता क्या है ......... ?????/
कहीं कुछ की वजह से बदनाम हैं तो उनको याद कौन करेगा जो शहीद हो गए हैं ,सबकी नज़र में एक ही छबी बसी हुई है पुलिस डिपार्टमेन्ट की, उनको किस-किस ने देखा जो बलि चढ़ गए सिर्फ हमारे लिए हमारे देश के लिए ये बात सोचने की है एक सिपाही और एक आतंकवादी दोनों के क्या मकसद है दोनों को मिलता क्या है
ये कड़वा सच लेकिन दोनों को एक ही नज़र से देख रहे हो आप, किया नहीं करता भारतीय सिपाही ने उसकी
एवज में उसे मिलता क्या है सिर्फ़ बदनामी और रिश्वतखोरी का तमगा ..........
और आतंकवादियों को मिलता है ऐशो आराम जी भर उडाने के लिए पैसे ......
अब बताये लालची कौन है वो जिसे रिश्वतखोरी का तमगा दिया आपने या
वो आतंकवादी जो बिना किसी बात के लोगो की बलि चड़ा रहा है जिसने आतकवाद को अपना रोजगार बना लिया है..........
मैंने मरने के लिए रिश्वत ली है ,मरने के लिए घूस ली है ????
๑۩۞۩๑वन्दना
शब्दों की๑۩۞۩๑

अक्षय-मन
padhna aap aapke article ne dehla diya ye baat logo tak pahuinchani jarori hai ,,,,,
un sainikon ke sahas ke liye balidaan aur samarpandesh ki hamari raksha ke liye jo bina kisi swarth se bina matlab ke hamare jaan de dete hain

shama said...

Badee nirash hunki, meree shrinkhala'"Phir ek baar pe" comment karnewaale...itne manse padhnewale aaj khamosh kyon hain??Kyon koyi kuchh padkebhi likh nahee raha ? Isme sochneki kya baat hai...are sirf itna to keh sakte hain ki ham aapke saath hain??Ham sab ek hain? Maine Akshay ke blogpe likha tha ki ateriki sirf atireki hote hain...unka koyi mazhab nahee...ULF, LTTE, Naxalwaadi sanghatnayen, panjab me khalsa ki maang...uski vajahse hua qatle aam...malegaonme pakde gaye army ke afsar...kaun hain ye??Kya dharam aur mazhab hai inka? Kya ham ,bharteey honeke naate apni apni taurse lalkar nahee sakte ki ham ek hain ? Hame taqseem karneme atireki sanghatnaye safal safal nahee hongee...ham hone nahee denge....kya Ashok, karkare...ye sab maare gaye hamaree aur unke pariwarwalonke aankhonke samne...unka balidaan wyarth jayega??

Amit K. Sagar said...

लोग जितनी दिलचस्पी किसी जीवन के अंदरूनी पहलुओं में लेते हैं, उतनी दिलचस्पी सामाजिक सारोकारों में कतई नहीं लेते. ये बात कटाक्ष है, सत्य है. और ये आदमी की बड़ी कमजोरी है. जब हम सामजिक और देश के हालातों को बेहतर करने व अपना योगदान देने के लिए हर वक्त तत्पर हों तो निश्चय ही हमारी निजी जिंदगियां भी बेहतर हों.

आतंकवाद आजका मसला नहीं. चूँकि आजकल जोरों पर है. लोग तब भी खामोश हैं. शर्म की बात है. इस तरह के कई मसलों के लिए इन्टनेट पर मेरी फोन पर कई सूरमाओं से कई बार भिड़ंत हुई. चूँकि उन्हें कोई वास्तविक न क्षणिक मतलब था न दूरगामी सो निष्कर्ष के निकलने की बात ही कहाँ थी. मेरा दावा है, जो लोग आज खामोश हैं, उनके घरों में, उनके पडोसन में धमाके हों तो निश्चित हो उनकी नींद उडेगी और वो बौखला जायेंगे इस तरह का अमानवीय कृत्यों से और फ़िर उनके अन्दर भी शायद जोश आए...कुछ करने का. अंत में; लोग इंतज़ार में है...देखियेगा...होना है क्या-क्या...

"उल्टा तीर" पर अब करीबन १ माह हो ही चुका है, "आतंकवाद" पर बहस को चलते हुए...चूँकि हमें बेहतर कल चाहिए, और आज के सभी अमानवीय व दंशों से मुक्ती चाहिए, कुछ बेहतर निकल सके, हमारे लिए...इसलिए मैंने न चाहकर भी "उल्टा तीर" पर दूसरी पोस्ट समाधान खोजें...का विचार किया...पर इस पूरे माह में शर्मिन्दगी के सिवा कुछ नज़र नहीं आ रहा...ये नकारात्मकता नहीं...मगर अंदेशा है बुरी चीज़ों का यूँ ही घटे रहना...जो लोग दम भरते हैं...समाज और देश की भलाई के लिए...बड़े मक्कार हैं...दरअसल वो अभी भी उसी भीड़ मैं शामिल हैं...जहाँ सिर्फ़ उन्हें ख़ुद को एक बड़ी ऊंचाई पर स्थापित करना है और कुछ नहीं.

जो लोग अभी भी "आतंकवाद" के संदढ़ में कुछ कहना चाहते हैं...बहस में भाग लेना चाहते हैं...तो "उल्टा तीर" पर आयें.

"शमा" जी, आपको तो जैसे मैं व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ; आप महान हैं. समझा जा सकता है कि उम्र के इस पढाव पर भी आपको अपने समाज और देश की कितनी फ़िक्र है.
---
अब तक आपके ब्लॉग पर बोलता न था, पर अब बोला करूंगा...
---
अमित के. सागर

Dr. Nazar Mahmood said...

मुझे लगा काश कोई उन वर्दी धारी सिपहियोंको शुभकामनायें तो देता....उनके बच्चों, माँ ओं तथा अन्य परिवारवालोंका इस माध्यमसे धाडस बंधाता...! किसीकेभी मन या दिमागमे ये बात नही आयी॥


waqai zaroorat hai sawndensheel hone ki. good work

नीरज गोस्वामी said...

शमाजी
आपने और सागर जी ने ग़लत समझा है...कई बार पोस्ट पढ़ कर मन इतना उदास और खिन्न हो जाता है की कुछ कहते नहीं बनता....आप की पोस्ट मैंने पहले ही पढ़ ली थी लेकिन सच कहूँ हालात कुछ ऐसे थे की टिप्पणी करने का मन ही नहीं हुआ...क्या कहता? मन का दुःख शब्दों में बयां करना मुश्किल लगा इसलिए आप को पढ़ा लम्बी साँस ली और छोड़ दिया...आप ने एक दम सच, बल्कि कडुआ सच लिखा है...आप के जज़्बात की मैं दिल से कद्र करता हूँ...मेरे ख्याल से हर संवेदनशील इंसान आप से सहमत होगा...अभी बस इतना ही....शेष फ़िर...
नीरज

dr.bhoopendra singh said...

shama ji,aap ne ek jwalant samasya ko bahut sensitive tarike se uthaya hai.yaha samaya badhaiyon ka nahi yuddh ka hai .shanti ke mantra atankvaad ka zahar nahi utar sakte.sabhi shahidon ko shraddhanjali dena hi kafi nahi. yaha bhee dekhna hoga ki kya ham vastava mein unke priyajano ke saath vaha sab ker sake jiski ummeed un shahido ki rahi hogi?kya unki suvidhayen, aadar hum dey paye?agar nahi to kaun doshi hai ?koshish jari rahe desh ke liye, desh ke saath chalne ki, jalne ki.jaihind
sadar dr.bhoopendra

dr.bhoopendra singh said...

shama ji,aap ne ek jwalant samasya ko bahut sensitive tarike se uthaya hai.yaha samaya badhaiyon ka nahi yuddh ka hai .shanti ke mantra atankvaad ka zahar nahi utar sakte.sabhi shahidon ko shraddhanjali dena hi kafi nahi. yaha bhee dekhna hoga ki kya ham vastava mein unke priyajano ke saath vaha sab ker sake jiski ummeed un shahido ki rahi hogi?kya unki suvidhayen, aadar hum dey paye?agar nahi to kaun doshi hai ?koshish jari rahe desh ke liye, desh ke saath chalne ki, jalne ki.jaihind
sadar dr.bhoopendra

डुबेजी said...

kya karen shama ji hum bhartiye bike hue hain lord clive ke jamane se aaj tak aur iski keemat kuch jaanbajo ko apni jaan de kar chukani padti hai . i salute nsg commandos who are carrying out rescue operations in mumbai

अखिल तिवारी said...

pata nai kyun abhi TV band karke achanak se laga ki shayad shama ji ne aaj ke mudde par kuchh jaroor likha ho. aur jaisa socha tha usse kai guna jada prerak likh padhne ko mila..
bahut achcha likhti hein. asha hai ham sab kuchh prerna jaroor lenge aapki baaton se.

निशाचर said...

शमा जी, बड़ी प्रसन्नता हो रही है यह देखकर कि आपके पाठको कि संख्या दिन - प्रतिदिन बढ़ती जा रही है. मैं आपका ब्लॉग इस श्रृंखला के प्रारंभ से भी पूर्व से पढ़ता आ रहा हूँ और अब मैं आपकी सभी पोस्ट नियमित रूप से पढ़ता हूँ. मैं आपकी बात से पूरी तरह इत्तेफाक रखता हूँ कि पुलिस वालों को अपनी जान जोखिम में डाल कर इतनी मुश्किल डयूटी करने के बदले जो तनख्वाह दी जाती है वह एक चपरासी की तनख्वाह से भी कम होती है. दरअसल ये पुलिस वालों को भ्रष्टाचार के लिए मजबूर करने हेतु राजनीतिज्ञों द्वारा अपनाई गई रणनीति है ताकि पुलिस वालों की गर्दन इनके पैरों तले दबी रहे और ये पुलिस वाले समाज में बदनाम रहें . इस तरह वे राजनीतिज्ञों के निजी लठैतों की तरह काम करते रहेंगे और उनके हाथ कभी भ्रष्ट, चोर, नीच राजनीतिज्ञों के गिरेबान तक नहीं पहुचेंगे...... परन्तु मैं ये कभी नहीं समझ पाया कि एक IPS को तमाम तरह की सुविधाएँ तथा बेहतर तनख्वाह मिलती है फिर वे भ्रष्टाचार में क्यों लिप्त होते हैं ?? क्यों वे, जो कि इतनी कड़ी प्रतियोगिता और प्रतिष्टित परीक्षा को पास करने के बाद सेवा में आते हैं, इन जाहिल और असभ्य राजनेताओं के हाथों अपनी दुर्गति कराते हैं ??
शमा जी, ये तंज नहीं अपितु गंभीरता से पूछा गया प्रश्न है और मैं समझता हूँ कि आपसे बेहतर इस प्रश्न का उत्तर कोई और दे नहीं सकता......... हो सके तो उत्तर अवश्य दें.

Akshaya-mann said...

अक्षय,अमर,अमिट है मेरा अस्तित्व वो शहीद मैं हूं
मेरा जीवित कोई अस्तित्व नही पर तेरा जीवन मैं हूं
पर तेरा जीवन मैं हूं......

poojiniye shama ji ko shat-shat naman....
unka bete ke jaisa huin.....
jitna kahuinga kam hoga.....
maa ke liye bete ki aur bete ke liye maa ki bhawnaay kya hongi khud shama ji samajhti hain us pyar ko us dard ko us ehsaas ko.......
usi tarhan hi ye article nahi dil ki awaaz hai jo zor se aapse binti kar rahi hai....
aur ye vishwaas kar rahi hai ki aap unke sath ho kadmon se kadam milakar bahut saari awaazain aur sur ek wo hai deshprem aur desh bhakti ka sur...

aap hamare sath hona ek hi kadam aur ek hi sur mai.../

mujhse jyada aap par shama ji vishwaas karti hain .....

to pls unke vishwaas ko kabhi matt todna.....

mei aapse hath jodkar binti karta huin...

kyunki shayad mei bhi aapke bete ya chote bhai jitna hi bada honga..

mere sath to maa ka pyar aur ashirwaad hai.....

aapka baccha ....

अखिल तिवारी said...

http://antartam.blogspot.com/2008/11/blog-post.html

विवेक said...

पुलिसवालों की तरफ से बहुत सटीक सवाल उठाए हैं आपने...यूं लगा जैसे मेरे मन में कुलबुलाती बातें आपने कह दीं...

shama said...

Aur ek baat kehne jaa rahee hun...ab mai khamosh nahee rahungi...bohot ho gaya ab mujhe garajke barasna hai, nidartase...ek documentary banane jaa rahee hun...mukhyataha, aatakvaad, jateeywaad, aur surakshake muddoko leke...jo sachhaee hai, wo samne lana chahti hun. Ham mese bohotse hain jo is baatse anabhigya hain, ki hamare antargat suraksha karmiyonke haath kistarahse baandhke rakhe hue hain. Unke oopar jo grihmantralay hai, jisme IAS ke afsar baith te hain, police ko leke saare nirnay we log lete hain aur ve log kabhibhi ye adhikaar apne haathonse chhootane nahi denge..badee afsoski baat hai, jawabdehi policewalonko karni padtee hai, jabki nirnay IAS ke afsranke hote hain !Kaisi ajeeb duvidhame hamare uchhstareey suraksha karmi rehete hain...na ugalte banta hai na nigalte...unhen apna muh kholneki tak ijazat nahee..

amit(shipra ka deewana ) said...

आम आदमी के दिल की बात आप की जबान से निकल गई और मुझ जैसे आम आदमी को ही हिला गई,इस धारदार लेखन के लिए एक बहन को फिर से इस नाचीज से भाई का सलाम

amit(shipra ka deewana ) said...

लकिन बहन आप नए सिर्फ़ पुलिस वालो का एक ही पहलू देखा है ,उस के दूसरे पहलू को भी उजागर करो ,बिना किसी जुर्म के मेरा एक दोस्त आज इन पुलिस वालो की महरबानी से ६ मुकदमे झेल रहा है ,उस का कसूर सिर्फ़ इतना था की उस ने एक पुलिस वाले की मगरूर लड़की से शादी कर ली ,और अपने बुढे माँ बाप को घर से नही निकला

Udan Tashtari said...

पढ़ तो चुका था मगर कुछ भी कहने को/ सुनने को मन न था. आज कुछ बेहतर लगा तो चला आया. आपकी बातों मे सच्चाई है, सोच है. सच, हालात चिंतनीय हैं.

संगीता-जीवन सफ़र said...

आपने बहुत सही लिखा है!हम सब को अपने देश के लिये एकजुट होकर और जागरुक होकर इसे जड से खत्म करना होगा|बहुत ही हिम्मत और धैर्य से एक नये सिरे से इसका हल खोजना होगा|हममें से प्रत्येक को कहना होगा बस अब और नही|

Akshaya-mann said...

sirf nari ke sine mei hi dil aur wo shakti kyun hoti hai......?

wo hi samajhti hai jisne khoya hai apna
beta,apni beti,apna bhai,apna pati phir bhi
wo hi kyun aage badti hai..

uske paas dil bhi hai aur shakti bhi apne aap mei har jagha purn har tarf se viksit.....


->adhura mein huin bas "main"...

shkti hai to dil nahi kisi ko bhi nahi dekhta kisi ko nahi bakshta....

aur dil hai to shakti nahi kisi par julm hote dekh to hai

aur char aansu baha sakta hai par us julm rok nahi sakta na koshish karta.....

ye "main" huin "main" ek "aadmi"

Harkirat Haqeer said...

शमाजी, आपकी राष्‍ट्रभक्‍ति और साहस देख गदगद हो गई अल्‍लाह आपको सहयोग दे और आप अपने
मकसद में कामयाब हों। मैं कुछ परिवारिक समस्‍याओं में उलझी रही आपके ब्‍लाग पर न आ सकी।
कभी आपकी ही तरह बहुत जोश रखती थी मैं पर इतनी बार टूटी अब हिम्‍मत ही नहीं होती...अक्षय जी
,अमित जी,और निशाचर जी आप सब का प्रयास जरूर रंग लायेगा अपनी अवाज बुलंद रखें। शमा जी,
मैंने भी ये महसूस किया है कि लोग इस बात पे टिप्‍पणी करने से घबरा रहे हैं हम अगर साहित्‍यकार ही
इस प्रकार जज्‍बा न रखें तो इससे बडी़ शर्म की और क्‍या बात होगी...! शमा जी हम सब आपके साथ हैँ
आप आगे बढें...बढती रहें...शुभकामनाएं!

Harkirat Haqeer said...

शमाजी, आपकी राष्‍ट्रभक्‍ति और साहस देख गदगद हो गई अल्‍लाह आपको सहयोग दे और आप अपने
मकसद में कामयाब हों। मैं कुछ परिवारिक समस्‍याओं में उलझी रही आपके ब्‍लाग पर न आ सकी।
कभी आपकी ही तरह बहुत जोश रखती थी मैं पर इतनी बार टूटी अब हिम्‍मत ही नहीं होती...अक्षय जी
,अमित जी,और निशाचर जी आप सब का प्रयास जरूर रंग लायेगा अपनी अवाज बुलंद रखें। शमा जी,
मैंने भी ये महसूस किया है कि लोग इस बात पे टिप्‍पणी करने से घबरा रहे हैं हम अगर साहित्‍यकार ही
इस प्रकार जज्‍बा न रखें तो इससे बडी़ शर्म की और क्‍या बात होगी...! शमा जी हम सब आपके साथ हैँ
आप आगे बढें...बढती रहें...शुभकामनाएं!

dr. ashok priyaranjan said...

शमा जी,
आपने अपनी इस पोस्ट में पूरे देश की पीडा को अिभव्यक्त िकया है । यह एेसी घटना थी िजसने सभी को अंदर तक झकझोर िदया । दहशत, गम और मायूसी के आलम में बहुत सारे सवाल जेहन में उभरते रहे । आपने एेसे कई सवालों को बडे प्रभावशाली ढंग से उठाया है । पुिलसकिमॆयों के त्याग, समस्या और कतॆव्यिनष्ठा को शब्दबद्ध करके आपने उनके कई प्रेणादायक पक्षों को उभारा है । आतंकवाद से िनपटने के िलए िमलजुलकर ही प्रयास करने होंगे । आपके जज्बे को मेरा समथॆन और ह्दय से सम्मान ।

http://www.ashokvichar.blogspot.com

shama said...

Mai har pathak ki tahe dilse shukrguzaar hun...saathi Shri Raj Singh jeene jo mujhe hausala diya hai, documentery finance karneke liye aur press conference ka aayojan karke(Puneme 5 Dicembar ko), Hindi Yugm ke sahakaryse,unhen mai ekbaar phir dhanywad dena chahungi...gar wo is samay mere saath kahade na hote to shayad financeke kaaran mai chahkebhi atak gayi hoti...eeshawar unhen hamesha khush rakhe, aur hame sanmati de...!

राज भाटिय़ा said...

शमा जी , आप का लेख तो काफ़ी पहले ही पढ लिया था, लेकिन द्ल ओर दिमाग काम नही कर रहै थे, ओर अन्दर ही अन्दर गुस्सा भी बहुत था, आज दोवारा से आप का लेख पढा, आप ने बिलकुल सच लिखा है, आप का एक एक शव्द सही है,धन्यवाद

Akshaya-mann said...

Shri Raj Singh ji ko bahut-bahut subhkaamnay......

1.ek dr. ko bhagwaan mante...kyonki wo hamari jaan bachata hai....

2.us sipahi ko bhi ishwar ka roop hi manta huin..wo bhi jaan bachta hai..

3.shri raj ji aur shama ji aur unke jaise ko bhi bhagwaan hi manta huin..
kyunki unki aastha mei koi dharm koi jaat nahi insaniyat basi hui hai...
wo bhi sharir ko nahi aatma ko swach aur saaf kar rahe har burai se...

aapko hamesha bhagwaan...swasth aur sukhi rakhe...aapka baccha..

Vijay Kumar Sappatti said...

Shamaji,
aapka lekh padkar , man aur dukhi ho gaya . maine akshay ko bhi kaha tha ki , hamne sarkar ko chun kar desh unke hawale kiya hai , aur ye unki jimmedari hai ,jo ki nahi nibha rahi hai . aur shama ji jo aapne aaklan kiya hai police walon ka ,mujhe laghta hai ki desh ke netao ko jarur padna chahiye ... lekin ek hi baat kahunga , ki hum sab ek hai , hum poore dil se apne deshbhakton ke saath hai .

दोस्तों , मेरी ये नज़्म , उन सारे शहीदों को मेरी श्रद्दांजलि है , जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर , मुंबई को आतंक से मुक्त कराया. मैं उन सब को शत- शत बार नमन करता हूँ. उनकी कुर्बानी हमारे लिए है .

शहीद हूँ मैं .....

मेरे देशवाशियों
जब कभी आप खुलकर हंसोंगे ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी नही हँसेंगे...

जब आप शाम को अपने
घर लौटें ,और अपने अपनों को
इन्तजार करते हुए देखे,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरा इन्तजार नही करेंगे..


जब आप अपने घर के साथ खाना खाएं
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
जो अब कभी भी मेरे साथ खा नही पायेंगे.

जब आप अपने बच्चो के साथ खेले ,
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
मेरे बच्चों को अब कभी भी मेरी गोद नही मिल पाएंगी

जब आप सकून से सोयें
तो मेरे परिवार को याद कर लेना ...
वो अब भी मेरे लिए जागते है ...

मेरे देशवाशियों ;
शहीद हूँ मैं ,
मुझे भी कभी याद कर लेना ..
आपका परिवार आज जिंदा है ;
क्योंकि ,
नही हूँ...आज मैं !!!!!
शहीद हूँ मैं …………..

Amit K. Sagar said...

काफ़ी खुशी हुई लोगों की बहुतियात को देखते हुए. उम्मीद है बुराई के ख़िलाफ़ सभी एक साथ खड़े रहेंगे.
--
आओ आतंकवाद से लड़ें (०१-१२-०८)
आतंकवादियों की ताभाही का मंसूबा सिर्फ़ मुंबई या फ़िर दिल्ली हिया नहीं...६ आतंकवादी मुंबई से दिल्ली को और रूख किए हुए हैं. हो सकता है कि वो आज की तारीख में दिल्ली में ही हों. पर सुरक्षा इंतजामों के नज़रिए से उनका दिल्ली में होना या अपने मंसूबों को अमली जमा पहनाना एक ख़्वाब ही रह सकता है. यही बेहतर होगा हम सबके लिए. मगर हम अपने डगमगाए हुए यकीन को संभाले रखें यह भी मुमकिन नहीं. अतः हमें सतर्क रहना होगा. साथ ही हमारे सुरक्षा तंत्र को चाहिए कि वो पूरी इमानदारी से काम करे. और आतंकवादियों को दिल्ली से ही नहीं अपितु देश से निकाल फेंके, कड़ी से कड़ी सज़ा इन्हें दी जाए. किसी भी तरह बख्शा न जाए. और अब हिन्दुस्तान की लड़ाई पूरी तरह से आतंकवाद के ख़िलाफ़ यूँ होनी चाहिए कि आतंकवादियों की रूहें तक काँप उठें हिंदुस्तान में कदम रखने के नाम पर. कुछ ऐसा होगा तभी हम आंतकवाद के साए से महफूज़ महसूस कर पायेंगे. ज़रूरत है हमें जागरूक होने की. संगठित होने की, एक-दूसरे से कदम मिलाके चलने की. इम्मंदारी बरतने की. सरकार को चाहिए कि वो कड़े से कड़े क़ानून लागू करे. जहाँ भी ढिलाई बरती जायेगी...हम मात खा सकते हैं.
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अब हमें आतंकवाद का खंडन न करके समाधान निकालना है. आतंकवाद को ख़तम करने का. जल्द ही ये विषय "उल्टा तीर" पर होगा. आओ आतंकवाद मिटायें: सभी से गुजारिश है, अपनी-अपनी राय सभी देंगे...हम कैसे आतंकवाद को मिटा सकते हैं...आप लोगों की छोटी सी छोटी बात महत्वपूर्ण होगी और यकीन कीजिये. आपका बोलना जाया नहीं जायेगा.

"संगठित हों, बुराई के ख़िलाफ़ ताकत बनें. एक-दूसरे के साथ हों, महफूज़ हर कदम चलें."

जय हिंद
अमित के. सागर

NirjharNeer said...

shama jii mai aapke lekh padh chuka hun bas tippni nahi di kyuki
aise haalaat pe kuch kahna bahot muskil hota hai haan mehsoos karta hun har baat ko .

bas itna hi kahunga ki ..

hum sudhrenge to yug sudhrega

Hindustani said...

सच कहा है
बहुत ... बहुत .. बहुत अच्छा लिखा है
हिन्दी चिठ्ठा विश्व में स्वागत है
टेम्पलेट अच्छा चुना है
कृपया मेरा भी ब्लाग देखे और टिप्पणी दे
http://www.ucohindi.co.nr

KAVITA RAWAT said...

Itni sambedana, itna dard, itna apanepan se bhara lekh dil jhakjhorta hai. Kaash aapki tarah hi es jahan mein log dusaron ko itna hi apna samajhte to kitna sundar ye jahan hota...
Khushi hoti hai ki aise lekh ya aise logon se milkar jo sabke liye sochate hain kuch kar gujarne ka jajba sada rakhte hain .
Bahut badhai ..