Wednesday, June 11, 2008

मेरे जीवनसाथी: 2

मेरा और विनयजी का परिचय होके कुछ दो महीने गुज़रे होंगे कि उनका तबादला दिल्ली मे, डेप्युटेशन पे हो गया। उन्हें दिल्ली जाना था। मेरी माँ ने हमारे दिलकी बात भाँप ली थी। हम दोनोने तो आपसमे कुछ कहा नही था,लेकिन माँ ने सीधा सवाल कर दिया!!मेरे परिवारसे विरोधका कोई सवाल ही नही था। मेरी परवरिश केवल एक हिन्दुस्तानी के भाँती हुई थी, लेकिन जानेसे पहले विनय ने मुझे आगाह कर दिया कि वे अपनी माँ की मर्जी के ख़िलाफ़ एक क़दम भी नही उठाएंगे। उन्होंने मुझे और मेरी माँ को अपने परिवारवालों से मिलने दिल्ली बुलाया। हम दोनों गए। उनके घरका वातावरण काफी रूढीवादी था, जबकि मेरे संस्कार बिलकुल अलग थे। ये फर्क माँ को प्रखरता से महसूस हुआ। ऐसा नही के मुझे नही हुआ। मनमे एक डर तो पैदा होही गया, पर मैं उनके घरके सभी रीती-रिवाज अपनाने को तैयार थी। उनके घरमे नौकर चाकर रखनेकी हैसियत नही थी, और मैं घरका हर छोटा बड़ा काम करनेके लिए तैयार थी। मुझे किसीभी काम की कोई शर्म महसूस नही होती थी। मुझे यही सिखाया गया था। आगे चलके ज़िन्दगीमे ये एहसास हुआ कि, ये सब बांते इतनी आसान नही होती,जितनाकी हम सोंचते हैं। बरसों बाद हमारी शादीकी वर्ष गाँठ पे मैंने अपने दोस्तों से हँसते-हँसते कहा कि प्यार केवल अंधा नही होता, गूंगा बेहराभी होता है!!वाकई, इस ब्याह्को लेके मैंने हर इशारा जो खतरेकी ओर अंगुली निर्देश करता था, मैंने नज़रअंदाज़ कर दिया था!एक पुर खतर राह्पे निकल पडी थी!!जवानी का जोश था....उम्र की कमसिनता !!
हम दोनोकी उम्र का फासला भी तकरीबन ८/९ सालका था!वैसे ये बात शादीकी सफल-असफलतामे कोई मायने नही रखती!
दिल्लीमे हुई उस भेंट की एक और बात मुझे याद है(वैसे तो कई बांते याद हैं...)। विनय मुझे लेके एक होटेलमे गए । मुझसे क्या लोगी पूछा, तो मैंने संतरे का ताज़ा रस माँगा!तबतक मुझे चाय, कोफ़ी, इतर पेय,जैसेकि कोका कोला आदी मेसे किसीभी चीज़की आदत नही थी। वहाँ ताज़ा-ताज़ा किसीभी फलका रस नही था!इन्होने मेरे लिए कोका कोला मँगवाया। मैं पहली बार उसे चख रही थी!एक घूँट लिया ना लिया कि मेरा ज़रूर बुरासा मुह बना होगा क्योंकि विनयने तत्काल मुझे डांटते हुए कहा,"ख़त्म करो उसे"!और जैसे कोई डरा हुआ बच्चा घटाघट दूध पी जाता है, मैंने वो ख़त्म किया!!जब इन चीजों की आदत हुई, तबतक ये सारी चीज़ें सहतके लिए कितनी हानिकारक होती हैं, ये पता चला!!खैर माँ और मैं लौट आए।
दोनों परिवारों के बीच विचारों का काफी आदान-प्रदान पत्रों द्वारा होता रहा। क़रीब डेढ़ सालके पश्चात हमारा रजिस्टर पद्धती से विवाह हुआ।खेतमे ,खुली हवामे बने घरसे निकल मैं दिल्लीके, एक आठवें मंजिलके फ्लैट मे आ गयी। उसमे केवल एक शयन कक्ष था। यहींसे हमारे खट्टे मीठे सहजीवन का आरंभ हुआ, जिसमे अन्य परिवारवाले भी शामिल थे। सच ही कहा था दादी ने...हिन्दुस्तान मे (मैं उस ज़मानेकी बात कर रही हूँ),लडकी का ब्याह सिर्फ़ एक व्यक्ती से नही होता, पूरे परिवार से होता है। अपने हाथों से कुछ गलती ना हो, इस बारेमे मैं हरदम सतर्क रहती थी।
शादीके कुछ ही दिनों बाद्की एक घटना मुझे याद आ रही है। इनके वास्ते सुबह मैंने नाश्ते के लिए अंडा तला ....बिलकुल उसी तरह जैसे कि मेरे मायकेमे तला जाता था। यहाँ तो तवाही था। फ्रायिंग pan तो था नही। टोस्टर भी नही था। मैंने तवेपेही ब्रेड सेकी और मक्खन लगाके इनके आगे प्लेट रखी। तभी घंटी बजी और कार पूलके अन्य तीन सदस्य घर मे आ खड़े हुए। (विनय को ये आदत अब भी है कि एकदम आख़री घड़ी तैयार होते हैं)!
इन्हों ने उस तले हुए अन्डेको एक नज़र देखा और और प्लेट परे खिसकाकर बोले,"ये अन्डेका क्या हाल बना रखा है तुमने?इतनी खुरचन किसलिए है? तुम्हें एक अंडा तलना नही आता?"
और बिना कुछ खाए ये चले गए। मुझे उन गैर लोगों के सामने इनकी डांट सुनना बडाही अपमानास्पद लगा। मेरी आँखें भर आयीं और अपना प्यारभरा नैहर बेहद याद आने लगा। खैर! दिन महीनोमे और महीने सालोंमे तबदील होते गए। अलग-अलग जगह हमारे तबादले होते रहे। घरमे बच्चों का आगमन हुआ। इसीके साथ हमारे सहजीवन मे कई उतार चढाव आते रहे।
क्रमशः

3 comments:

Udan Tashtari said...

बढ़िया रहा आपको पढ़ना..जैसे डायरी के पन्ने. जारी रहिये.

रवि रतलामी said...

आपके अनुभव तो वाकई रोमांचक हैं.

अनूप शुक्ल said...

अच्छा लिखा है आपने। अब आगे की कहानी का इंतजार है।